आतंकी दस्तक पाक नीति पर चिंतन का संकेत

रहीस सिंह
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मास्टर स्ट्रोक वाली लाहौर कूटनीति से उपजे शोरगुल पर इतना जल्दी विराम आतंकवादी लगा देंगे, इसकी संभावना शायद सभी को नहीं रही होगी। हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस हमले की निंदा की है, इसलिए सरकार के पास थोड़ी संतुष्टि जाहिर करने का अवसर है, लेकिन इसके बावजूद हमें कुछ चीजों को समझने की जरूरत है। पहली यह कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अचानक हुई लाहौर यात्रा से बने वातावरण, (यदि हकीकत में ऐसा कुछ हुआ हो) को इतना जल्दी आतंकवादी बिगाड़ देंगे, क्या इसका अनुमान दोनों सरकारों को था? यदि उच्चस्तर पर इससे अनभिज्ञता प्रकट की जाती है तो क्या इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि हमें स्वप्नलोक के आदर्श पेश करने की कृत्रिम कोशिश हो रही है या जो बताया जा रहा है वह असल में है ही नहीं? क्या यह हमला केवल चरमपंथ की देन है या फिर इसमें पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई बराबर की साझीदार है? क्या हमें इस बात पर विचार करने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान के साथ बात नहीं करने की अपनी चुनौतियां हंै और करने की अपनी और अतिजल्दबाजी में उठाए गये कदम की कुछ विशेष? सीधे सैन्य बेस को निशाना बनाकर आतंकवादी क्या संदेश देना चाह रहे हैं और भारत इसे किस रूप में ले रहा है? क्या इस हमले में यह संदेश निहित नहीं है कि रणनीतिक कूटनीति को वैयक्तिक लोकप्रियता और उत्सुकता पर नहीं, बल्कि गम्भीर अध्ययनों, आकलनों और विश्लेषणों से निकाले गये निष्कर्षों व रणनीतियों पर आधारित होना चाहिए?
2 जनवरी की सुबह पठानकोट स्थित भारतीय वायुसेना के ठिकाने पर हुई आतंकी कार्रवाई और उसके बाद सरकार की तरफ से ऑपरेशन पूर्ण होने की सूचना लेकिन अगले दिन पुन: आतंकवादियों की तरफ से फायरिंग, आतंकियों को ठिकाने लगाने के बाद भी बड़े गम्भीर संदेश दे रही है। पहली बात तो यह है कि पठानकोट वायुसैनिक बेस जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बीच स्थिति इस बेस पर ही मिग-21, एमआई-25 और एमआई-35 हमलावर हेलिकॉप्टर रखे गये हैं। इसलिए इसकी विशिष्ट सामरिक महत्ता है। दूसरी-खुफिया एजेंसियों ने जो इंटरसेप्ट्स प्राप्त किए हैं उसके अनुसार आतंकियों को उनके सरगनाओं की तरफ से आदेश दिया गया था कि, ‘चॉपर्स और प्लेनों को उड़ा दो।’ तात्पर्य यह हुआ कि आतंकी अब भारत के सुरक्षातंत्र को भेदने नहीं बल्कि सीधे उसे चुनौती देने का साहस दिखा रहे हैं। पठानकोट पर हमला करने वाले आतंकियों का सम्बंध पाकिस्तान आधारित जैश-ए-मुहम्मद से है (यह संगठन उसी मसूद अजहर का है जिसे 1999 के कंधार विमान अपहरण हादसे के बाद बंधकों को छुड़ाने के लिए भारतीय कैद से रिहा किया गया था) और जैश-ए-मुहम्मद को इस समय पाकिस्तान की सेना तथा आईएसआई की विशेष कृपा प्राप्त हो रही है। इसलिए भारत सरकार को इसकी गम्भीरता को समझना होगा और यह तय करना होगा कि वार्ता और लाहौर जैसे कदमों तथा सामरिक आवश्यकता के बीच किस प्रकार का साम्य स्थापित करे।
पठानकोट हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू की टिप्पणी का संयुक्त सार यह निकलता है कि पठानकोट में हमला करने वाले समूह को पाकिस्तान के कुछ तत्वों से मदद मिली है और भारत इसका मुंहतोड़ जवाब देगा। इसमें कोई संशय नहीं है कि इस हमले में पाकिस्तानी तत्व शामिल हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान के निहितार्थ क्या हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत इसका मुंहतोड़ जवाब देगा? यहां पर दो सवाल महत्वपूर्ण हैं। पहला यह कि पाकिस्तान अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध के जरिए भारत में घुसकर लगातार हमले कर रहा है, लेकिन भारत अब तक तो ऐसे जवाब नहीं दे पाया है, फिर अब कैसे देगा जब नयी कूटनीति भारत-पाकिस्तान रिश्तों को भिन्न आयाम दे रही हो। दूसरा यह कि यदि भारत ऐसा करना भी चाहे तो वह ऐसा जवाब देगा किसे? पाकिस्तान को या पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद को? इसके लिए पहले तो यह सिद्ध करना होगा कि ऐसा पाकिस्तान ने ही किया। फिर पाकिस्तान में जाकर कार्रवाई करनी होगी। यह भी निर्धारित करना होगा कि यह कार्रवाई किसके विरुद्ध हो-पाकिस्तान या जैश-ए-मुहम्मद के विरुद्ध। क्या भारत आतंकी संगठन के खिलाफ अमेरिका की तरह कोई ऑपरेशन करेगा या फिर पाकिस्तान की सरकार को जैश-ए-मुहम्मद के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन के लिए राजी करेगा? फिलहाल ये दोनों ही विकल्प संभव नहीं हैं। तो फिर वही पुरानी परम्परा निभाई जाएगी जिसमें भारत पाकिस्तान की सरकार से आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेगा, डोंजियर सौंपेगा और पाकिस्तान सरकार उन्हें अपर्याप्त बताकर या तो कार्रवाई न कर पाने की असमर्थता प्रकट करेगी या फिर वह छुट-पुट कार्रवाई करेगी लेकिन वहां के न्यायालय पर्याप्त सबूतों के अभाव में उन्हें रिहा कर देंगे। भारत सरकार कुछ समय के लिए अनमनी होगी और फिर नई कवायद शुरु हो जाएगी। फिर इतने बड़े बोल क्यों?

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