आज भी जिंदा है अंबेडकर की विरासत

विडंबना यह है कि जाति की जकड़बंदी से मुक्ति के लिए, उसके आधार हिंदू धर्म का ही त्याग करने की अंबेडकर की महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक कार्रवाई को भी, इस आधार पर उनके हिंदू धर्म-संस्कृति का पैरोकार होने का सबूत बनाने की कोशिश की जा रही है कि फिर भी उन्होंने ईसाई धर्म या इस्लाम को नहीं अपनाया! उनका विद्रोह हिंदू धर्म से नहीं, उसकी विशेष रूप से जातिवादी विकृतियों से था।

 राजेंद्र शर्मा
डॉ.भीमराव अंबेडकर की सवा सौवीं जयंती के मौके पर, उनकी विरासत में वैसे तो हर तरफ से दिलचस्पी दिखायी जा रही है, जो कि स्वाभाविक भी है। दलितों के मसीहा के रूप में, जो भारत के मौजूदा संविधान के निर्माता भी थे, अंबेडकर की विरासत आज भी न सिर्फ जिंदा है बल्कि शायद पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक है। इसे देखते हुए, प्रत्यक्षत: ‘दलित राजनीति’ करने वालों के अलावा अन्य ताकतों की ओर से भी इस विरासत पर प्रतिस्पद्र्घी दावे सामने आना स्वाभाविक है। बहरहाल, आज के संदर्भ में दो ऐसे विरोधी छोरों से आ रहे दावे खासतौर पर प्रासंगिक हैं, जिनके खुद अंबेडकर और उनकी परंपरा से रिश्ते विरोध के न भी माने जाएं तब भी, समस्यापूर्ण जरूर रहे थे।
इनमें एक दावेदारी तो संघ परिवार और उसके राजनीतिक बाजू के रूप में भाजपा तथा उसकी सरकार की ही है। डॉ. अंबेडकर की सवा सौवीं सालगिरह मनाने में नरेंद्र मोदी की सरकार ने निश्चित रूप से अतिरिक्त उत्साह का प्रदर्शन किया है। देश-विदेश में अंबेडकर से संबंधित स्मारकों के निर्माण, संरक्षण, संवद्र्घन से लेकर, संसद के विशेष सत्र का आयोजन तक, इसमें शामिल हैं। लेकिन, यह प्रयास सिर्फ उत्सवधर्मिता तक ही सीमित नहीं है, जिसमें मोदी सरकार को खासतौर पर महारत हासिल है। इसके साथ ही साथ और शायद इससे कहीं बढक़र, पिछले काफी अर्से से संघ परिवार अपने ‘मंडल’ में आंबेडकर को भी खपाने की कोशिशों में लगा रहा है। इसके लिए अंबेडकर की छवि का खासतौर पर दोतरफा मेकओवर किया जा रहा है। एक ओर से उन्हें हिंदू समाज के सुधारक का रूप दिया जा रहा, तो दूसरी ओर उन्हेें संदर्भ से कटे हुए चंद उद्घरणों के बल पर मुुस्लिमविरोधी बनाया जा रहा है। विडंबना यह है कि जाति की जकड़बंदी से मुक्ति के लिए, उसके आधार हिंदू धर्म का ही त्याग करने की अंबेडकर की महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक कार्रवाई को भी, इस आधार पर उनके हिंदू धर्म-संस्कृति का पैरोकार होने का सबूत बनाने की कोशिश की जा रही है कि फिर भी उन्होंने ईसाई धर्म या इस्लाम को नहीं अपनाया! उनका विद्रोह हिंदू धर्म से नहीं, उसकी विशेष रूप से जातिवादी विकृतियों से था।
बहरहाल, आज आंबेडकर को इस तरह हजम करने की कोशिशें तेज किए जाने का एक कारण और है। ‘हिंदू राष्ट्र’ की ब्राह्मïणवादी परियोजना के लिए जैसा ‘हिंदू एकीकरण’ जरूरी है, संघ परिवार की नजरों में आंबेडकर की परंपरा उसके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। इसीलिए, आंबेडकर को खासतौर पर मुस्लिमविरोधी बनाकर हजम करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन, ‘हिंदू राष्ट्र’ के लिए अंबेडकर को हजम करना जितना जरूरी है, उतना ही मुश्किल भी। इसकी सीधी सी वजह यह है कि इस परियोजना के साथ, इसके पीछे काम कर रही ब्राह्मïणवादी ताकतों के साथ, आंबेडकर का रिश्ता हमेशा से कट्टïरविरोध का रहा था।
दूसरे ध्रुव पर, वामपंथ की ओर से अंबेडकर की परंपरा पर दावा किया जा रहा है बल्कि कहना चाहिए कि उसके साथ अपने संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश की जा रही है। यह कोशिश, ‘हिंदू राष्टï्र’ बनाने की परियोजना में लगी ताकतों के सत्ता तक पहुंच जाने और उसकी अंबेडकर की परंपरा को हजम करने की कोशिशों के संदर्भ में हो रही है। वास्तव में इसकी शुरुआत जितनी वैचारिक स्तर पर हो रही है, उससे ज्यादा जमीनी स्तर पर हो रही है। चेन्नई आईआईटी में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर हमले ने, वामपंथी तथा अंबेडकर की परंपराओं की निकटता के जिस रेखांकन की शुरुआत की, उसे हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित स्टूडेंट्स एसोसिएशन पर शासन के हमले और रोहित वेमुला के आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाने के प्रकरण ने, गाढ़े रंग से रेखांकित कर दिया। जेएनयू तक आते-आते, वामपंथी और अंबेडकरवादी, शासन की नजरों में एक ही हो चुके थे। अब अफजल गुरु की फांसी का विरोध करना और महिषासुर शहादत दिवस मनाना, शासन की नजरों में एक जैसा अपराध थे—देशद्रोह। यही वह जगह है जहां से जय भीम लाल सलाम का नारा निकला है, जिसे देशद्रोह के आरोपी जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष, कन्हैया कुमार ने खासतौर पर लोकप्रिय कर दिया है। वैसे इसकी शुरूआत के सूत्र भी कहीं महाराष्टï्र में ही मिलेंगे, तभी तो प्रसिद्घ प्रतिबद्घ फिल्म निर्माता, आनंद पटवद्र्घन ने अब से कई वर्ष पहले अपनी फिल्म को नाम ही दिया था—जयभीम कामरेड।

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