आगामी चुनाव की झलक

विधानपरिषद और राज्यसभा चुनावों की वजह से सप्ताह भर पहले से ही विधायकों और वीवीआईपी लोगों का जमावड़ा लखनऊ में होने लगा था। जिन विधायकों को खुद उनकी पार्टी ने कभी महत्व नहीं दिया, उनकी अचानक से पूछ बढ़ गई। इतना ही नहीं खुद को उपेक्षित मानने वाले लोग गौरवान्वित महसूस करने लगे। जो लोग सामान्य दिनों में एक दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते थे, वे चुनाव के दिन गलबहियां करते नजर आए।

sanjay sharma editor5उत्तर प्रदेश में विधानपरिषद और राज्यसभा चुनाव का परिणाम आने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टियों के भविष्य की झलक दिखाने का काम करेगा। इसके साथ ही 2017 में होने वाला चुनाव कौन की पार्टी किसके साथ मिलकर लड़ेगी। इस बात का इशारा भी मिल जायेगा। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों के साथ ही आम जनता की नजर भी विधानपरिषद और राज्यसभा के चुनाव परिणाम पर टिकी हुई है।
विधानपरिषद चुनाव में विधायकों की क्रॉस वोटिंग ने राजनीतिक दलों की एकता और अनुशासन की पोल खोल कर रख दी है। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस चारों महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की तरफ से अपने-अपने उम्मीदवारों को जिताने का हर संभव कोशिश की गई। विधानपरिषद और राज्यसभा चुनावों की वजह से सप्ताह भर पहले से ही विधायकों और वीवीआईपी लोगों का जमावड़ा लखनऊ में होने लगा था। जिन विधायकों को खुद उनकी पार्टी ने कभी महत्व नहीं दिया, उनकी अचानक से पूछ बढ़ गई। इतना ही नहीं खुद को उपेक्षित मानने वाले लोग गौरवान्वित महसूस करने लगे। जो लोग सामान्य दिनों में एक दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते थे, वे चुनाव के दिन गलबहियां करते नजर आए। इन्हीं लोगों ने पार्टी में अपनी तरह के नेताओं को साथ जोडऩे में अहम भूमिका भी निभाई। वह सपा से नाराज रामपाल यादव हो या फिर गुड्डू पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हुए। वहीं राज्यसभा का पर्चा भरते समय निर्दलीय उम्मीदवार प्रीति महापात्रा के साथ मौजूद रहने वाले पीस पार्टी प्रमुख डॉ. अयूब खान ने अपने तीन विधायकों के साथ कांग्रेस को खुला समर्थन दिया। बीएसपी से निष्कासित और बसपा सुप्रीमो से नाराज विधायक राजेश त्रिपाठी ने एमएलसी चुनाव में भाजपा के पक्ष में मतदान किया। राजनीतिक दलों की तरफ से भी इन विधायकों के एक-एक वोट को महत्वपूर्ण मानकर खूब आव-भगत और मुंह मांगी मुराद पूरा करने की कोशिश की गई। अब सबकी निगाह विधान परिषद और राज्यसभा के चुनाव परिणामों पर है। राज्यसभा की 11 और विधान परिषद की 13 सीटों का परिणाम आने वाले विधानसभा चुनाव की रणनीति तय करेगा।
यदि विधानपरिषद और राज्यसभा चुनावों के दौरान विधायकों की क्रॉस वोटिंग और उनकी बयानबाजी का विश्लेषण करें, तो सत्ताधारी पार्टी में नाराज विधायकों की संख्या अधिक दिख रही है। चुनाव में सबसे अधिक सपा के विधायकों की तरफ से ही क्रॉस वोटिंग की गई। इस चुनाव में भाजपा के रणनीतिकार अन्य दलों की अपेक्षा विधायकों का वोट अपने पक्ष में करने में अधिक सफल हुए। इतना ही नहीं राजनीति में स्वहित से बढक़र कोई धर्म नहीं होता है, इस बात की भी पुष्टि हो चुकी है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में भी दल-बदलू हावी रहेंगे, जो सारी राजनीतिक पार्टियों और विश्लेषकों का गुणा गणित खराब करेंगे, यह बिल्कुल ही तय लग रहा है।

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