आखिर माया क्यों नहीं करतीं रोजा इफ्तार

  • सीएम अखिलेश यादव, गवर्नर राम नाईक और गुलाम नबी आजाद ने भी की थी रोजा इफ्तार पार्टी
  • सभी राजनीतिक दल हमेशा करते हैं रोजा इफ्तार का बड़ा आयोजन
  • मुस्लिमों को लुभाने की रणनीति का एक हिस्सा बन गया है रोजा इफ्तार
  • राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी करता है रोजा इफ्तार का आयोजन
  • मुस्लिमों को अपने पाले में कर रही माया ने इस बार भी नहीं किया रोजा इफ्तार का आयोजन

संजय शर्मा
Captureलखनऊ। मायावती अपनी शैली से हमेशा चर्चा में रहती हैं। पिछले कई महीनों से मुसलमानों को अपने पाले में लाने के लिए उन्होंने दिन रात एक कर दिया है। वह ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ती, जिससे वह मुस्लिमों को यह संदेश दे सके कि वह उनकी सबसे बड़ी हितैषी है। उनके इस तरह के कदम से अनुमान लगाया जा रहा था कि वह इस बार रोजा इफ्तार का आयोजन करेंगी। मगर इस बार भी उन्होनें इस आयोजन से दूरी बनाए रखी तब राजनैतिक गलियारों में यह सवाल चर्चा का विषय बना कि माया आखिर क्यों नहीं करती रोजा इफ्तार पार्टी। हालांकि जब वह सीएम थीं तो उन्होंने एक फाइव स्टार होटल में रोजा इफ्तार की पार्टी दी थी।
इस बार भी सूबे में सीएम अखिलेश यादव, राज्यपाल रामनाईक और कांग्रेस के प्रभारी गुलाम नबी आजाद की रोजा इफ्तार पार्टी चर्चा का विषय बनी रही। इन इफ्तार पार्टी से राजनैतिक हित साधने का खंडन सभी करते हैं और कहते है कि रोजा रखने वालो के साथ शाम को खाने से सवाब मिलता है, मगर हकीकत यह है कि यह इफ्तार पार्टियों सिर्फ और सिर्फ मुस्लिमों को संदेश देने के लिए की जाती है कि वह उनके साथ है।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ द्वारा दी गई इफ्तार पार्टी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई थी। इन सब चर्चाओं के बीच मायावती अपनी पुरानी शैली पर है। वह अपनी पुरानी शान को कम नहीं करना चाहती। मायावती की तरफ से नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने गोमती नगर में एक बड़ा रोजा इफ्तार का आयोजन कराया था। माना जा रहा था कि मायावती इस आयोजन में शामिल होंगी, मगर वह नहीं आईं। इस आयोजन में बड़ी-बड़ी एलईडी लगाई गई, जिसमें मायावती बोलती नजर आ रही थी, मगर यहां आए लोगों ने व्यक्तिगत बातचीत में यह सवाल जरूर किया कि आखिर मायावती उन सबके बीच कभी बैठकर कुछ क्यों नहीं खा सकती हैं। जाहिर है जब यूपी चुनाव में कुछ महीने ही बचे हैं तो यह सवाल बसपा को भारी पड़ सकता है।

इस समय बहनजी पैसा इकठ्ठा करने में लगी हुई हैं। उन्हें सामाजिक समरसता और एकता का संदेश देने की फुर्सत कहां है। यह अलग बात है कि चुनावी भाषणों में हमेशा खुद को दलितों, पिछड़ों और उपेक्षितों का रहनुमा बताती फिरती हैं।
स्वामी प्रसाद मौर्य,
पूर्व नेता विरोधी दल

मायावती को सामाजिक मूल्यों और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से कोई लेना-देना नहीं है। वह सिर्फ दौलत की बेटी हैं और सारा काम दौलत के लिए ही करती हैं। उन्हें मुस्लिमों के वोट तो चाहिए, मगर वह मुस्लिमों के साथ बैठने को तैयार नहीं है।
अरविन्द सिंह गोप
ग्राम्य विकास मंत्री

सभी राजनीतिक दलों की तरह बसपा को भी सामाजिक एकता का संदेश देना चाहिए, मगर मायावती की राजनीति में इस तरह की गुंजाइश नहीं।
रीता बहुगुणा जोशी
विधायक कांग्रेस

मायावती को अगर किसी के साथ दौलत मिलने की आशा हो तो वह उसके साथ बातचीत कर सकती हैं। इनका मुस्लिम प्रेम सिर्फ दिखावा है। हकीकत यह है कि उन्हें न मुस्लिमों से और न दलितों से कोई मतलब है उन्हें सिर्फ दौलत से ही
मतलब है।
आईपी सिंह प्रवक्ता, भाजपा

Pin It