आखिर छूट ही गया दादरी…

यह बहुत ही दुखद है कि इस गांव में कितने सालों से यह परिवार हंसी-खुशी रह रहा था, आज उसी घर में ताला बंद कर दूसरे शहर आशियाना बनाने को मजबूर होना पड़ा। अ$खलाक के परिवार को यह फैसला करने में निश्चित ही बहुत कठिनाई हुई होगी। अपने पुश्तैनी घर, जमीन से कितना लगाव होता है यह बताने की जरूरत नहीं है।

sanjay sharma editor5आखिर अ$खलाक के परिजन बिसाहड़ा गांव छोडक़र चले ही गए। सरकार के सुरक्षा के आश्वासन देने के बावजूद परिवार के लोग गांव से पलायन कर गए। अखलाक के परिजन अब दिल्ली में रहेंगे। दो अक्टूबर को दादरी के बिसाहड़ा गांव में गोमांस खाने की अफवाह को लेकर अ$खलाक की हत्या कर दी गई थी। इस मामले को लेकर पूरे देश में सियासत हुई। सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने फायदे के लिए बड़बोलेपन से लोगों को उकसाने और नफरत फैलाने की कोशिश की। इस घटना के सहारे देश का माहौल बिगाडऩे की पूरी कोशिश की गई थी। सबकी कोशिश थी कि मामला और बढ़े।
उत्तर प्रदेश सरकार केन्द्र से पूरे देश में बीफ पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रही थी तो भाजपा के कई नेता हिंदुत्व का दम भर रहे थे। गोमांस खाने को लेकर अ$खलाक की हत्या कर दी गई। उनका बेटा घायल हो गया। परिवार डरा-सहमा अपने घर में कैद हो गया और नेता सियासत करने से बाज नहीं आए। सरकार ने अ$खलाक के परिवार को 45 लाख रुपए की आर्थिक मदद दी और सुरक्षा का आश्वासन दिया लेकिन उन्हें अपने गांव में सुरक्षा का एहसास नहीं हुआ। उन्हें प्रदेश के पुलिस-प्रशासन पर भरोसा नहीं हुआ इसलिए वह गांव छोडक़र चले गए।
यह बहुत ही दुखद है कि इस गांव में कितने सालों से यह परिवार हंसी-खुशी रह रहा था, आज उसी घर में ताला बंद कर दूसरे शहर आशियाना बनाने को मजबूर होना पड़ा। अ$खलाक के परिवार को यह फैसला करने में निश्चित ही बहुत कठिनाई हुई होगी। अपनी पुश्तैनी घर, जमीन से कितना लगाव होता है यह बताने की जरूरत नहीं है। यह भी सही है कि जब सुरक्षा का एहसास नहीं है तो कितने दिनों तक कोई डर-डर के जिदंगी गुजारेगा। ऐसा ही नजारा मुजफ्फर नगर में हुए दंगों के बाद दिखा था। दंगा पीडि़त बहुत से परिवार अपने गांव से पलायन कर गए थे। हिंदू-मुस्लिमों की लड़ाई में अधिकतर मामलों में यह देखने में आया है कि जहां एक बार साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ता है, दोबारा वहां अमन-चैन लौटने में कई बरस लग जाते है।
उत्तर प्रदेश की पुलिस की कार्यप्रणाली किसी से छिपी नहीं है। पुलिस खुद ही सुरक्षित नहीं है तो वह लोगों को कैसे सुरक्षा देगी, यह बड़ा सवाल है। इस घटना पर कल प्रधानमंत्री ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने दादरी और मशहूर गजल गायक गुलाम अली के मुद्दे पर अफसोस जाहिर किया और कहा कि जो हुआ वह दुखद है। प्रधानमंत्री के बयान के बाद तो अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने बयानबाजी शुरु कर दी। अजीब विडंबना है जब प्रधानमंत्री नहीं बोलते तो नेता चुप्पी तोडऩे के लिए कहते हैं और जब प्रधानमंत्री चुप्पी तोड़ते हैं तो उस पर भी सियासत। कुल मिलाकर हमारे नेताओं को किसी न किसी बहाने सियासत करनी है।

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