आखिर क्यों बच्चों को बार-बार मोहरा बनाता है सीएमएस

ऐसे शिक्षण संस्थान में छात्रों को गुणवत्तापरक शिक्षा मिल पाने पर भी उठ रहे सवाल

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह सिटी मान्टेसरी स्कूल (सीएमएस) के विभिन्न कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के रूप में 12 से अधिक बार शामिल हो चुके हैं। वह स्कूली बच्चों और उनके अभिभावकों के सामने सरकार की तरफ से गुणवत्तापरक शिक्षा के उद्देश्य से चलाई जाने वाली विभिन्न योजनाओं और सरकारी तंत्र के प्रयासों की चर्चा कर चुके हैं। लेकिन सीएमएस स्कूल में शिक्षा के अधिकार को लागू करने में जिस तरह की नाफरमानी का मुजाहिरा किया गया, उस पर एक शब्द भी नहीं बोले। इतना ही नहीं गृह मंत्री ने सीएमएस की अवैध इमारतों और उन इमारतों को अवैध कब्जे से मुक्त कराने में नाकाम साबित हो चुके अधिकारियों, प्रवर्तन दल के सामने स्कूली बच्चों को मोहरा बनाकर इस्तेमाल करने वाले इस संस्थान के खिलाफ एक भी लफ्ज नहीं बोला। शायद इसी वजह से ऐसे शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के अधिकार के तहत गरीब बच्चों का एडमिशन करवाने की खातिर स्वयंसेवी संगठनों को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।
सीएमएस ऐसा शिक्षण संस्थान है, जहां मंत्रियों, विधायकों, शासन और प्रशासन स्तर के अधिकारियों के अलावा बड़े व्यवसायियों के बच्चे पढ़ते हैं। इस स्कूल में मंत्रियों और अधिकारियों का किसी न किसी कार्यक्रम में शामिल होने के बहाने आना-जाना आम बात है। स्कूल प्रबंधन अनेकों प्रकार की सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेता है। इसमें विभिन्न प्रकार की बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक करना, मतदाताओं को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करना, महिला अधिकारों और महिला सुरक्षा के मुद्दे पर बहस, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों और यातायात संबंधी कार्यक्रमों का आयोजन करता है। इन सभी कार्यक्रमों में बच्चों को स्कूल प्रशासन अपनी मर्जी के मुताबिक स्कूल आने और स्कूल से जाने का आदेश देता है। यदि स्कूल की तरफ से किसी रैली का आयोजन किया जाता है, तो अचानक से स्कूली बच्चों के परिजनों के मोबाइल पर संदेश भेजकर सुबह 6 बजे पहुंचने और निर्धारित ड्रेस में आने की जानकारी दी जाती है। ऐसे में परिजनों के सामने सबसे बड़ी मुसीबत अचानक से प्रसारित संदेश के अनुसार बच्चे को स्कूल जाने के लिए तैयारी करना होता है। सबसे बड़ी बात है कि बहुत से ऐसे कार्यक्रम होते हैं, जिनसे स्कूली बच्चों का कोई सरोकार नहीं होता है। इसके बावजूद सीएमएस का प्रबंधन तंत्र स्कूली बच्चों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। हाल ही में न्यायधीशों का एक सेमिनार सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम में सीएमएस की सभी शाखाओं के छोटे से बड़े सभी बच्चों को सुबह 6 बजे बुलाया गया था। जबकि सेमिनार में छाटे बच्चों को कुछ समझ में नहीं आया। बच्चों को इससे कोई लाभ भी नहीं मिला। इसके बाद भी बच्चों को प्रबंधन तंत्र की तानाशाही की वजह से सेमिनार में जाना पड़ा।
गौरतलब हो कि सीएमएस अपने स्कूल में पढऩे वाले बच्चों का पहले भी मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर चुका है। इस स्कूल के प्रबंधन तंत्र ने अपनी इंदिरानगर स्थित ब्रांच के खिलाफ कार्रवाई करने पहुंचे आवास विकास के प्रवर्तन दल और जेसीबी के सामने स्कूली बच्चों को सडक़ पर लेटने को मजबूर कर दिया था। इस मामले में आवास विकास परिषद की तरफ से प्रबंधन तंत्र के खिलाफ स्कूली बच्चों का बेजा इस्तेमाल करने और सरकारी काम में बाधा ड़ालने की रिपोर्ट भी लिखाई गई थी। इसके बावजूद स्कूल प्रशासन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कई गई। इसी प्रकार जब-जब सीएमएस की किसी भी ब्रांच में अवैध कब्जे को हटाने की कार्रवाई करने टीम पहुंची स्कूली बच्चों को सडक़ पर लिया दिया गया। इसी प्रकार शिक्षा के मौलिक अधिकार के तहत गरीब बच्चों का एडमिशन लेने से भी सीएमएस ने इंकार कर दिया। यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, कोर्ट ने स्कूल प्रबंधन को तत्काल गरीब बच्चों का निर्धारित संख्या में एडमिशन करने का आदेश दिया। लेकिन संस्थान ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने भी स्कूल प्रशासन को नियमानुसार गरीब बच्चों का दाखिला लेने का आदेश दिया। तब जाकर सीएमएस स्कूल में 13 गरीब बच्चों को दाखिला मिला।
सवाल उठता है कि जिस संस्थान में स्कूली बच्चों का कानूनी फैसलों और सरकारी कामों के खिलाफ अपने मतलब की खातिर इस्तेमाल किया जाता है। जिस स्कूल की आधे से अधिक ब्रांच के खिलाफ अवैध कब्जे की शिकायतें हैं। जो स्कूल कोर्ट के आदेशों को ताक पर रखकर मनमानी करता है। उस स्कूल में मंत्रियों, नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के बेटे पढ़ते हैं। स्कूल प्रबंधन स्कूली बच्चों के माध्यम से मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपने खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं होने का सफल प्रयास करता है। ऐसे स्कूल के बारे में सब कुछ जानने के बाद भी नेता और प्रशासनिक अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। ऐसे संस्थान के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय उसकी तरफ से आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में खुशी-खुशी शिरकत करते हैं। ऐसे में गरीब बच्चों और संस्थान में पढऩे वाले बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा मिल पायेगी, उनके अधिकारों और उनकी सुरक्षा स्पष्ट हो पायेगी। इसको लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को अपने स्वार्थवादी राजनीति से ऊपर उठकर संस्थान के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। स्कूल प्रबंधन की तरफ से दबाव बनाने के सारे प्रयासों को दरकिनार कर देना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ, तो विभिन्न कार्यक्रमों और आदेशों में बच्चों के अधिकारों और गुणवत्तापरक शिक्षा दिलाने की सारी बातें बेमानी साबित हो जायेंगी।

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