आखिर कैसा समाज बना रहे हैं हम

महिलाओं के मामलों में जनप्रतिनिधियों द्वारा पहली बार ऐसी टिप्पणी नहीं की गई है। देश के कई सियासी दलों के लोग ऐसा बयान पूर्व में दे चुके हैं। सवाल यह है कि क्या जनप्रतिनिधि को इस तरह के बयान देने चाहिए? क्या यह मंत्री की मानसिकता को नहीं दर्शाता है? क्या यह बयान समाज के सामंती और पुरुषवादी सोच का प्रतीक है? महिलाएं क्या पहनें, क्या या नहीं पहनें, इसका निर्धारण समाज के कुछ तथाकथित ठेकेदार तय करेंगे?

sajnaysharmaबेंगलुरू के पॉश इलाके में नए साल के जश्न के दौरान महिलाओं के साथ सरेआम छेड़छाड़ की गई। वहां मौजूद शोहदों के चंगुल से महिलाओं ने खुद को किसी तरह बचाया। पुलिस की मौजूदगी के बावजूद ऐसी शर्मनाक घटना घटी। इस मामले ने जब तूल पकड़ा तो कर्नाटक के गृहमंत्री जी. परमेश्वर ने इस घटना पर दुख जताने की बजाय इसका सारा दोष महिलाओं पर ही मढ़ दिया। मंत्री जी ने कहा कि महिलाओं द्वारा पहने गए पश्चिमी परिधानों की वजह से यह घटना घटी। मंत्री जी यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि ऐसी छेड़छाड़ की घटनाएं नए साल पर होती रहती हैं। मंत्री की टिप्पणी को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस्तीफा देने और देश की महिलाओं से माफी मांगने की मांग की है। महिलाओं के मामलों में जनप्रतिनिधियों द्वारा पहली बार ऐसी टिप्पणी नहीं की गई है। देश के कई सियासी दलों के लोग ऐसा बयान पूर्व में दे चुके हैं। सवाल यह है कि क्या जनप्रतिनिधि को इस तरह के बयान देने चाहिए? क्या यह मंत्री की मानसिकता को नहीं दर्शाता है? क्या यह बयान समाज के सामंती और पुरुषवादी सोच का प्रतीक है? महिलाएं क्या पहनें, क्या नहीं पहनें, इसका निर्धारण समाज के कुछ तथाकथित ठेकेदार तय करेंगे? अंतिम और सबसे अहम सवाल यह है कि हम किसी समाज का निर्माण कर रहे हैं? ऐसी टिप्पणियों से साफ है कि हम कहने भर को आधुनिक हुए हैं। विचारों से आज भी समाज का एक तबका सामंती सोच से संचालित हो रहा है। वह इस दायरे से बाहर नहीं आ पा रहा है। पुरुषवादी सोच से संचालित ऐसे लोग आज भी महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव कर रहे हैं। भू्रण हत्या, दहेज प्रथा जैसी कुरीतियां इसी सोच का परिणाम हैं। ऐसे लोग स्त्री को घर की चाहरदीवारी में कैद रखना चाहते हैं। उनके लिए स्त्रियां मात्र वस्तु हैं। स्त्रियों का भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है, इसे समाज का एक तबका स्वीकार नहीं कर पा रहा है। हैरत यह है कि यह सब तब हो रहा है जब भारत के संविधान में पुरुषों और स्त्रियों को बराबर का दर्जा दिया गया है। आज महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। केवल परिधान के आधार पर अपनी ओछी मानसिकता को पुष्टï करना किसी तरह से उचित नहीं है। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक पुरुष अपनी ओछी मानसिकता से बाहर नहीं आएगा। समाज को केवल रहन-सहन नहीं विचारों से भी आधुनिक होना होगा। सरकार को भी ऐसी टिप्पणी करने वाले लोगों से सख्ती से निपटना चाहिए।

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