आखिरी दौर में शीतकालीन सत्र

संसद की कार्यवाही के दौरान पूरी दुनिया की निगाह भारत पर टिकी होती है। संसद देश का मंदिर है और प्रत्येक मिनट का खर्चा लाखों में आता है। करोड़ों-अरबों रुपये बहसबाजी में बर्बाद करना कहीं से उचित नहीं है। जनता की गाढ़ी कमाई का उपयोग जनता के लिए ही होना चाहिए।

sanjay sharma editor5संसद का शीतकालीन सत्र आखिरी दौर में पहुंच गया है। यह सत्र भी मानसून सत्र की भंाति हंगामें की भेंट चढ़ गया था। जनहित में कोई कार्यवाही नहीं हुई थी। एक बार फिर विपक्षी दलों ने संसद में कार्यवाही नहीं होने दी। संसद के दोनों सदनों में सिर्फ हंगामा होता रहा। केन्द्र सरकार लगातार संसद चलाने की गुहार लगाती रही लेकिन विपक्षी दल सुनने को तैयार नहीं हुए। कुल मिलाकर देखा जाए तो यह सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ गया। पिछले मानसून सत्र में संसद के दोनों सदनों के 119 घंटे की कार्यवाही ललित गेट और व्यापमं पर हुए हंगामे की भेंट चढ़ गई। इसके साथ ही 1.78 अरब रुपये भी स्वाहा हो गए। कई महत्वपूर्ण बिल पर चर्चा तक नहीं हो पायी। ऐसा ही कुछ शीतकालीन सत्र में भी दिखा।
इस सत्र से सभी को उम्मीद थी कि इसमें कुछ सार्थक कार्यवाही होगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं दिखायी दे रहा है। संसद सत्र के दो ही दिन बचे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद में कौन से बिल पर सुनवाई होती है। पिछला सत्र सुषमा, ललितगेट के मुद्ïदे पर बर्बाद हुआ और यह सत्र नेशनल हेराल्ड के मुद्दे पर। संसद में विपक्षी दल लगातार आक्रामक मुद्रा में नजर आये तो सत्ता पक्ष असहज मुद्रा में दिखा। हालांकि संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चले, इसके लिए प्रधानमंत्री ने भी विपक्षी दलों से सहयोग की अपील की लेकिन परिणाम सबके सामने हैं। फिलहाल अब यह परंपरा में आ गया है कि जो पार्टी विपक्ष में होती है वह संसद की कार्यवाही के दौरान सरकार को घेरने की कोशिश करती है। जब यूपीए का शासन था तो भाजपा ने भी संसद को कई बार चलने से रोका था। अब जबकि मानसून सत्र शुरू हो गया है तो विपक्षी पार्टियों को संसद की गरिमा का ध्यान रखते हुए संसद की कार्यवाही में खलल नहीं डालना चाहिए।
दरअसल संसद की कार्यवाही के दौरान पूरी दुनिया की निगाह भारत पर टिकी होती है। संसद देश का मंदिर है और प्रत्येक मिनट का खर्चा लाखों में आता है। करोड़ों-अरबों रुपये बहसबाजी में बर्बाद करना कहीं से उचित नहीं है। जनता की गाढ़ी कमाई का उपयोग जनता के लिए ही होना चाहिए। इसलिए कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक पार्टियों को संसद में जनहित के मुद्दों पर बहस कर जरूरी बिल पास करने में सहयोग करना चाहिए।

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