आखिरकार यूपी में भी शराब बंदी बन ही गया चुनावी मुद्दा

  • नीतीश कुमार की यूपी में शराब बंदी की मांग पर अखिलेश यादव ने तोड़ी चुप्पी
  • गन्ना किसानों का हवाला देकर शराब बंदी को बताया लम्बी प्रक्रिया वाला काम

Captureप्रभात तिवारी
लखनऊ। बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में शराब बंदी को चुनावी मुद्दा बनाने में नीतीश कुमार कामयाब हो गये हैं। उनकी तरफ से यूपी में शराब बंदी की मांग पर अखिलेश यादव ने चुप्पी तोड़ते हुए शराब बंदी में काफी वक्त लगने की बात कही और शराब बंदी से गन्ना किसानों को होने वाले नुकसान का हवाला दिया है। इससे स्पष्ट है कि शराब बंदी के मुद्दे को आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान आयोजित होने वाली चुनावी जनसभाओं में उछाले जाने को लेकर सपा काफी गंभीर है। वह आधी-आबादी का वोट बैंक बचाने को लेकर अभी से सक्रिय हो गई है।
जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमत्री नीतीश कुमार ने उत्तर प्रदेश में शराब बंदी का मुद्दा उठाकर आधी-आबादी यानी महिलाओं का समर्थन जुटाने की पहल शुरू कर दी है। उन्होंने बनारस में जनसभा के दौरान आपराधिक घटनाओं में बढ़ोत्तरी की मूल वजह शराब को बताया और महिलाओं की सुरक्षा के लिए शराब बंदी को आवश्यकता पर जोर दिया था। इसी मंच के माध्यम उन्होंने शराब बंदी को लेकर केन्द्र सरकार पर निशाना साधा और केन्द्र सरकार से पूरे देश में शराब बंदी लागू करने की मांग की थी। इसके बाद एक कार्यक्रम के सिलसिले में 15 मई को लखनऊ पहुंचे नीतीश कुमार ने रविन्द्रालय में अपने भाषण के दौरान शराब बंदी की बात दोहराई। उन्होंने अखिलेश सरकार से प्रदेश में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। इसके बाद कई दिनों तक शराब बंदी का मुद्दा सियासी गलियारे में छाया रहा। सपा के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने नीतीश कुमार की यूपी में आने पर ही सवाल खड़ा कर दिया था। इस पर जदयू के नेता केसी त्यागी ने पलटवार करते हुए कहा था कि नीतीश कुमार के यूपी दौरे पर सवाल उठाने वाले पहले इस बात का जवाब दें कि लोकसभा चुनाव में सपा बिहार में क्या करने गई थी ? जबकि नीतीश कुमार ने यूपी की राजधानी लखनऊ और बनारस में जनसभाओं के दौरान शराब बंदी की मांग करके नैतिक काम किया है।
अपने लखनऊ दौरे के दौरान नीतीश ने किसान मंच के एक कार्यक्रम में सपा सरकार से कहा था कि वह प्रदेश में पूर्णतया शराबबंदी लागू करे। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा था कि घबराइये नहीं अखिलेश जी, पूर्णतया शराबबंदी लागू कीजिए। जब बिहार में शराबबंदी लागू की गयी थी तो पीने वालों को तीन-चार दिन काफी परेशानी हुई लेकिन उसके बाद सब शांत और शुद्ध हो गये। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से यह आग्रह भी किया कि वह बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में सीमा से कम से कम पांच किलोमीटर की दूरी के भीतर शराब ना बिकने दें क्योंकि बिहार में शराबबंदी के बाद लोग सीमावर्ती जिलों में आकर शराब पी रहे हैं। उस समय सियासी गलियारों में इस पर खूब चर्चा हुई थी। करीब दो सप्ताह बाद अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ी और भदोही में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि शराब बंदी का मुद्दा महत्वपूर्ण है लेकिन प्रदेश को सबसे अधिक राजस्व देने वाले व्यवसाय को अचानक बंद नहीं किया जा सकता है। शराब को बनाने में गन्ने का भी इस्तेमाल होता है, इसलिए सरकार गन्ना किसानों का भी ध्यान रख रही है। उन्होंने कहा कि शराब बंदी एक लंबी प्रक्रिया है। इसलिए सभी पहलुओं पर विचार करने और किसानों को विकल्प मुहैया करवा कर ही शराब बंदी का फैसला लिया जा सकता है।
अपराध नियंत्रण की चुनौती
उत्तर प्रदेश में अपराधिक घटनाओं पर नियंत्रण का मुद्दा अत्यंत गंभीर है। इस मुद्दे पर विपक्षी दल प्रदेश सरकार के खिलाफ विधान सभा सत्र के दौरान आपराधिक घटनाओं के आंकड़े पेश करता रहा है। प्रदेश में होने वाली बड़ी-बड़ी घटनाओं को माध्मय बनाकर सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की जाती रही है। ऐसे में महिला सुरक्षा और अपराध पर नियंत्रण की दिशा में शराब बंदी को बेहतर फार्मूला बताने वाले नीतीश कुमार की मांग पर प्रदेश सरकार भी सोचने लगी है। इसी वजह से प्रदेश को विकास की ऊंचाई तक पहुंचाने की कोशिश में लगे अखिलेश यादव ने शराब बंदी को महत्वपूर्ण मुद्दा माना है, लेकिन तत्काल शराब की बिक्री पर रोक लगाने में असमर्थता जाहिर की है।

विदेशी शराब की बिक्री को बढावा, देसी पर खामोशी

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सूबे में शराब बंदी के मुद्दे पर तत्काल रोक लगाने पर असमर्थता जाहिर की। इससे गन्ना किसानों को होने वाले नुकसान का हवाला दिया लेकिन क्या वास्तव में गन्ना की खेती करने वाले किसान का शराब बंदी से काफी नुकसान हो जाएगा, जिसे बचाने के लिए मुख्यमंत्री ने विकल्प तैयार होने तक शराब बंदी के फैसले में देर लगने की बात कही है। जबकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सूबे में विदेशी शराब की बिक्री को बढ़ावा दे रहे हैं। प्रदेश में विदेशी शराब और बीयर की कीमतों में 5 से 24 प्रतिशत तक की कमी कर दी गई है। इससे विदेशी शराब की खपत में इजाफा हो रहा है। यूपी में विदेशी शराब की मांग बढऩे से देशी शराब का कारोबार प्रभावित हो रहा है। जहां तक शराब बनाने में गन्ने के इस्तेमाल की बात की जा रही है, तो गन्ने का इस्तेमाल देशी शराब बनाने में अधिक किया जाता है। यदि सरकार को वास्तव में गन्ना किसानों की चिन्ता है, तो देशी शराब की बिक्री को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि गन्ना किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए दर-दर भटकना न पड़े। सहकारी समितियां और देशी शराब बनाने वाली कंपनियां गन्ने की खड़ी फसल ही किसानों से खरीद ले। उन्हें अपनी फसल का मुंह मांगा मूल्य कैश के रूप में मिल जाए। गन्ना की कीमत लेने के लिए बार-बार सहकारी समितियों और कोर्ट का चक्कर लगाने से मुक्ति मिल जाए। तभी सही मायने में किसानों की खुशहाली आएगी।

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