आंदोलन से दूर आजम खान

आजम कीCapture नजर में मोदी देश के लिये बहुत बड़ा खतरा हैं,लेकिन अफसोस की बात यह है कि मोदी के खिलाफ आजम खान बयानबाजी तक ही सीमित रहते हैं। कभी इतने बड़े खतरे से जनता को बचाने के लिये आजम खान ने किसी तरह का आंदोलन करना जरूरी नहीं समझा, जबकि उनकी पृष्ठभूमि समाजवादी है,जो जनता के हित की लड़ाई सडक़ पर ही लड़ते हैं।

नेता बनना एक बात है और नेता होना दूसरी बात है। दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। नेता कोई भी बन सकता है,लेकिन नेता बस नहीं बन पाते हैं।आज के दौर में नेता बनने के लिये न तो नेतृत्व क्षमता की जरूरत है,न ही देश की जमीनी हकीकत को पहचानने की काबलियत होना जरूरी है।नेता को जनता के दुख-दर्द का अंदाजा हो या न हो, लेकिन सियाती दांवपेंच आना चाहिए। झूठ को सच और सच को झूठ बना देने का परक्रमी हो। जनता चाहे जितनी भी गाली दे,मुस्कुरा कर टाल देने की योग्यता होना भी जरूरी है।अगर यह गुण किसी भी व्यक्ति में है तो आज के दौर में वह सियासत की पिच पर अपनी पारी खेल सकता है।खासकर भारतीय राजनीति में तो यह काम काफी आसान है,जहां नेताओं का मतदाताओं के प्रति जुड़ाव न के बराबर दिखाई देता है। देशभक्ति जहां बेईमानी है। एक कौम को गाली देना और दूसरी कौम को गले लगाने की परम्परा जहां की राजनीति का हिस्सा हो उस देश का भला कौन कर सकता है। पिछले दो-तीन दशकों में स्वार्थवादी, जातिवादी, भय और वंशवाद की राजनीत से देश को कितना नुकसान हुआ है इसके आंकड़े अगर मौजूद होते तो निश्चित ही यह चौंकाने वाले होते।यह दुर्भाग्य की बात है कि एक तरफ तो हमारे तमाम नेता अपने बयानों से जनता को देश के सामने मौजूद खतरों से आगाह करते रहते हैं लेकिन दूसरी तरफ खुद कुछ नहीं करते हैं। ऐसा ही माहौल आजकल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बनाया जा रहा है। लोकतंत्र में वोटतंत्र अहम होता है लेकिन देश के आधे से अधिक नेता यह बात मानने को तैयार ही नहीं होते हैं। यहां तक की यह नेता प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री तक कहने में संकोच करते हैं।आजम खान साहब को ही ले लीजिये जिन्हें नरेन्द्र मोदी कभी प्रधानमंत्री नहीं लगे,मोदी के खिलाफ भड़ास निकालने का कोई भी मौका आजम खान छोड़ते नहीं हैं।आजम की नजर में मोदी देश के लिये बहुत बड़ा खतरा हैं,लेकिन अफसोस की बात यह है कि मोदी के खिलाफ आजम खान बयानबाजी तक ही सीमित रहते हैं। कभी इतने बड़े खतरे से जनता को बचाने के लिये आजम खान ने किसी तरह का आंदोलन करना जरूरी नहीं समझा, जबकि उनकी पृष्ठभूमि समाजवादी है,जो जनता के हित की लड़ाई सडक़ पर ही लड़ते हैं। आजम से हिन्दू संगठन तो नाराज रहते ही हैं कई मौलाना और धर्म गुरुओं को भी आजम की शख्सियत रास नहीं आती है। इसमें जामा मस्जिद के ईमाम बुखारी और प्रसिद्ध शिया धर्म गुरू मौलाना कल्बे जव्वाद जैसे नेता शामिल हैं।
समाजवादियों के आंदोलन का लम्बा चैड़ा इतिहास रहा हैं,लेकिन देश पर कोई भी संकट आये,जनता किसी भी नेता (बकौल आजम खान पीएम देश के लिये खतरा हैं) के भ्रम जाल में फंस जाये, आजम खान मात्र बयानबाजी करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। मोदी ही नहीं आजम ने कभी किसी भी ऐसे नेता के खिलाफ आंदोलन करना उचित नहीं समझा जिससे जनता को नुकसान हो रहा हो और वह देश के लिये खतरा हो। कम से कम पिछले दस-पन्द्रह वर्षों का इतिहास तो यही कहता है कि आजम ने कभी भी अपनी अगुवाई में कोई आंदोलन नहीं चलाया है। एक वाक्य में आजम की शख्सियत को समझना हो तो कहा जा सकता है कि आजम नेता कम नौटंकीबाज ज्यादा हैं।वह मुसलमानों की बात करते हैं। मुलायम की तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं लेकिन उनसे भला किसी का नहीं होता है। यही वजह है तमाम कोशिश के बाद भी आजम मुसलमानों के रहनुमा नहीं बन पाये हैं,जबकि इसके लिये वह वर्षों से प्रयासरत हैं।
उत्तर प्रदेश नगर विकास और संसदीय कार्यमंत्री आजम खान अपनी भड़ास निकालने के लिये किसी न किसी को तलाश ही लेते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तो वह अक्सर ही बादशाह और न जाने क्या-क्या कह कर तंज कसते रहते हैं। राज्यपाल राम नाईक को लेकर भी आजम के बोल बिगड़े ही रहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के पास तो इतना समय है नहीं कि वह आजम की बातों का जबाव दें और राज्यपाल राम नाईक भी कह चुके हैं कि वह आजम खान की किसी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना गैर जरूरी समझते हैं। मगर आजम ने तो जैसे कसम खा रखी है कि वह जब भी बोलेंगे तो उलटा ही बोलेंगे। जब उक्त दोनों नेताओं ने आजम की बयानबाजी को गम्भीरता से नहीं लिया तो आजम खान लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा के पीछे पड़ गये। आजम खान का कहना है कि मेयर साहब राजधानी में अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई नहीं चलने दे रहे हैं।सुनने में यह बात हास्यास्पद लगती है। आखिर एक मेयर इतना पावर फुल कैसे हो सकता है कि सरकार भी उसके समाने मजबूर हो जाये।
बहरहाल,आजम खान भले ही यह आरोप लगा रहे हों कि मेयर साहब अतिक्रमण नहीं हटाने दे रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि अतिक्रमण हटाने में सरकार ही पक्षपात कर रही है। अतिक्रमण हटाने के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है। उन इलाकों की तरफ से सरकार ने मुंह फेर रखा है जहां के बारे में आम धारणा यही है कि यहां समाजवादी पार्टी के वोट बैंक का दबदबा है, जबकि यह इलाका सबसे अधिक अतिक्रमण की चपेट में है। लखनऊ मध्य और लखनऊ पश्चिम विधान सभा क्षेत्र सबसे अधिक अतिक्रमण से प्रभावित है, लेकिन उक्त दोनों विधान सभा क्षेत्रों में फैला अतिक्रमण सरकार को नहीं दिखता है। इसका कारण भाजपाई तो यही बताते हैं कि उक्त दोनों विधान सभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के विधायकों की तूती बोलती है, वह ही अतिक्रमण कराते हैं, अब आजम खान साहब न तो अपने विधायकों को नाराज कर सकते हैं और न ही अपने वोट बैंक को? इसी लिये उनका सारा ध्यान ऐसे इलाकों पर है जहां भाजपा का जनाधार मजबूत है। यह भेदभाव काफी कुछ कहता है।
बात लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा की है तो वह तो कह रहे हैं कि जहां कहा जाये मैं अतिक्रमण हटाने के लिये चलने को तैयार हूं, लेकिन आजम खान को तो सियासत करना है। अतिक्रमण के लिये मेयर साहब और नगर निगम को तब तक पूरे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है जब तक कि पुलिस पैसा लेकर अतिक्रमण कराती रहेगी। अगर आजम खान सचमुच में अतिक्रमण को लेकर चिंतित हैं तो वह उन पुलिस वालों की शिनाख्त करा लें जो अतिक्रमण के लिये जिम्मेदार हैं। मगर वह ऐसा कर नहीं पायेंगे क्योंकि लखनऊ के थानों और चौकियों पर पुलिस अधिकारियों/ कर्मचारियों की कैसे तैनाती होती है किसी से छिपा नहीं है। एक नहीं कई बार यह चर्चा छिड़ चुकी है कि राजधानी के थाने बिकते हैं। यहां सत्तारूढ़ दल के नेताओं के चाहने वालों को ही तैनाती दी जाती है,जो अतिक्रमण और अपराध दोनों के बढऩे के लिये जिम्मेदार होते हैं। कई बार कहा गया कि जिन इलाकों में अतिक्रमण होगा वहां के थानेदारों के खिलाफ कार्रवाई होगी, लेकिन आज तक ऐसा हो नहीं पाया, जिसकी वजह से तरह-तरह के अपराधों की बाढ़ आ गई है। डग्गामार बसों का संचालन, भू-माफियाओं को संरक्षण, अतिक्रमण को बढ़ावा, अपराधियों के प्रति लचीला रुख सबके पीछे कहीं न कहीं खाकी और खादी का नापाक गठजोड़ ही काम कर रहा है। आजम खान अपना काम तो करते नहीं दूसरों को नसीहत बांटते रहते हैं, इसी वजह से वह आम जनता से दूर होते जा रहे हैं। प्रसिद्ध शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद के साथ आजम के इशारे पर कैसा व्यवहार किया जा रहा है, सबको पता है। सरकारी नाकामी और घटिया सियासत की वजह से ही सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ हो रहा हैं। बिजली चोरी रोकी नहीं जा रही है और जो ईमानदारी से बिल भर रहे हैं उन्हें तरह-तरह से प्रताडि़त किया जा रहा है। खनन माफियाओं की तरफ से तो आंख मूंद कर सरकार बैठ गई है। सिर्फ पीएम मोदी और राज्यपाल राम नाईक का प्रलाप हो रहा है। यह हकीकत सरकार में बैठे लोग नहीं देख पा रहे हैं लेकिन सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव समझ रहे हैं कि अगर अखिलेश सरकार के मंत्रियों ने अपना रवैया नहीं बदला तो 2017 में सपा को मुंह की खानी पड़ सकती है, इसी लिये मुलायम मंत्रियों को फटकार और कार्यकर्ताओं को नसीहत दे रहे हैं, लेकिन जिन्होंने कान में तेल डाल लिया है,वह सुनेंगे भी तो कैसे? अगर समाजवादी सरकार और उसके मंत्रियों को यह लगता है कि मोदी को कोस कर वह चुनाव जीत जायेंगे तो ऐसा होने वाला नहीं है।जनता को अब उल्लू नहीं बनाया जा सकता है।
आजम खान ही नहीं सपा के कई नेता और यहां तक की मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी इस झूठ की मुहिम का हिस्सा बने हुए हैं। आजम खान पीएम मोदी को झूठ का बादशाह बताते हैं? हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपये नहीं आने के लिये मोदी को कोसते हैं? केन्द्र में ठगों की सरकार का उलाहना देेते हैं? मोदी देश चलाने लायक नहीं का राग अलापा जाता है? मगर जनता जानती है कि केन्द्र सरकार की अच्छी मंशा के कारण आज गरीब से गरीब व्यक्ति भी जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा कराकर अपने परिवार को सुरक्षित करने में सफल हुआ है।भारत सरकार की पहल पर ही महंगे एलईडी बल्ब सस्ते में बांटे जा रहे हैं जिससे लोगों का बिजली का बिल कम हो रहा है। समाजवादी सरकार ने तो साढ़े तीन वर्षों में भी ऐसा कुछ नहीं किया। कहा जाता है कि मोदी अपने वायदे भूल गये। समाजवादी पार्टी को भी कौन से अपने वायदे याद हैं। हाईस्कूल और इंटर पास बच्चों को लैपटॉप और टेबलेट देने का वायदा, बेरोजगारी भत्ता, कन्या विद्या धन योजना, समाजवादी पेंशन योजना सबकी हकीकत जनता जानती है।
आजम खान खुद को पाक साफ बताते हैं। मुसलमानों के पिछड़ेपन का रोना रोते हैं,लेकिन जब किसी को विधान परिषद का सदस्य बनाने की बात आती है तो अपनी पत्नी को ही भेज देते हैं।तब वह यह नहीं सोचते हैं किसी और मुसलमान को विधान परिषद का सदस्य बना दिया जाये। एक साथ दो पदों पर बने रहने का मामला भी उनके खिलाफ चल रहा है। आजम बात गरीबों की करते हैं लेकिन उनके ही गृह जिले रामपुर में उनकी शह पर वाल्मिकी बस्ती को उजाडऩे की कोशिश होती है। सपा प्रमुख को उनके जन्मदिन पर लाखों खर्च करके विदेश से आई बग्घी पर घुमाया जाता है। उनकी जब भैंस चोरी हो जाती है तो पूरा पुलिस अमला जुट जाता है, लेकिन जब किसी गरीब की आबरू लुटती है तो उनके मुखिया कहते हैं कि बच्चों से गलती हो जाती है,एक साथ चार लोग रेप नहीं कर सकते हैं, लेकिन आजम खान मुंह से उफ भी नहीं करते हैं। उन्हें पता है कि पीएम और राज्यपाल को कोसना-काटना एक बात है और मुलायम के खिलाफ आवाज निकालने का मतलब सपा से बाहर जाने का रास्ता चुनना। एक बार आजम यह गलती कर चुके हैं अब वह शायद इसे दोहराना नहीं चाहेंगे।

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