आंकड़ों की बयार

जनसंख्या के संदर्भ में अमेरिका वाले ऐसे व्यक्ति, जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद, दम्पतियों की ऐसी घबराहट के वश पैदा हुए, कि कहीं युद्ध में उनके ज्यादा बच्चे न मारे जायें। कई संतानें पैदा कर बैठे। ये बच्चे (जो अब अधेड़ हैं), अपने को ‘बेबी बूमर्स’ कहते हैं। हमारे यहां द्वितीय विश्व युद्ध और उसके बाद भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति की कुछ झलक उस समय पैदा हुए व्यक्तियों की संख्या से मिलती है।
इंदिरा मिश्र
सामान्य लोग आंकड़ों के बिना ही काम चलाना चाहते हैं। किन्तु कहीं-कहीं तो आंकड़ों के बिना आपका जीना दुश्वार हो जाता है। अगर विगत कुंभ पर कितने लोग हरिद्वार स्नान करने आये थे, यह न पता हो, तो वहां आगे पदार्पण करने वाली जनता जनार्दन के लिए सुगम व्यवस्था कर पाना असंभव है।
तो अब हम बात करते हैं, भारत की जनगणना के 2011 के आंकड़ों की, जो रायपुर जिले के बारे में हैं। इस विषय पर भी इस सीमित स्थान में केवल यह बात की जा सकेगी, कि यहां आय वार कितने लोग रहते हैं, और उनमें से ग्रामीण क्षेत्र में कितने और शहरी क्षेत्र में कितने। सबसे पहले जिस आंकड़े ने मेरा ध्यान खींचा, वह था, 70 वर्ष की आयु समूह के लोगों ने । मुझे यह जान कर दु:ख हुआ कि मेरी आयु वर्ग के यहां कुल 32000 लोग हंै, और उनमें से भी महिलायें केवल 18117। शहरी महिलाएं केवल 4790। अत: यदि मैं नयी सहेली बनाने निकलूं तो मुझे इतने पर ही सीमित रह जाना पड़ेगा। जबकि इस जिले की कुल जनसंख्या 40,63,872 हैं।
इसके बाद आती है बिल्कुल छोटी आयु के वर्ग के लोगों की। एक वर्ष से छोटी उम्र के यहां कुल 80,000 बच्चे हैं, जबकि जनगणना के वर्ष 2011 के ठीक पहले के एक वर्ष को छोड़ कर पिछले 10 वर्ष में 81000 से यह संख्या कभी कम नहीं हुई थी। यह तो अच्छा है कि जनसंख्या का उफान अब कुछ घटने की ओर है, लेकिन बुरा यह है कि 1 वर्ष के 79983 बच्चों में से 41036 लडक़े और 38947 लड़कियां हैं अर्थात् लडक़ों से 1099 लड़कियां कम हैं। यही सिलसिला एकाध अपवाद को छोडक़र अगले 18 वर्षों में भी देखने में आता है। यानी आगे चल कर उतने लडक़े कुंवारे रह जायेंगे। अठारह वर्ष में 18000।
जनसंख्या के संदर्भ में अमेरिका वाले ऐसे व्यक्ति, जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद, दम्पतियों की ऐसी घबराहट के वश पैदा हुए, कि कहीं युद्ध में उनके ज्यादा बच्चे न मारे जायें। कई संतानें पैदा कर बैठे। ये बच्चे (जो अब अधेड़ हैं), अपने को ‘बेबी बूमर्स’ कहते हैं। हमारे यहां द्वितीय विश्व युद्ध और उसके बाद भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति की कुछ झलक उस समय पैदा हुए व्यक्तियों की संख्या से मिलती है। यहां 1944 में पैदा हुए यानी 2011 में 65 वर्ष की आयु के 41018 लोग हैं जबकि उसके पहले यह संख्या 12 से 15 हजार के बीच चल रही थी।
बूढ़ी महिलाओं की संख्या और हो सकती थी- 80 तथा 90 वर्ष की आयु वाली महिलाओं की स्थिति यह है कि 80 वाले कुल 9904 लोगों में से 4129 पुरुष और 5775 स्त्रियां थीं। गांवों में 3155 पुरुषों के मुकाबले 4184 महिलायें थी, जबकि शहरों में जहां डॉक्टर, अस्पताल आदि की सुविधा बेहतर है, 974 पुरुषों के पीछे 1591 महिलायें थी और 90 वर्ष के आयु समूह में 188 पुरुषों के पीछे 372 (लगभग दुगुनी) महिलायें थीं। पश्चिमी देशों में पुरुषों से महिलायें 10-15 वर्ष अधिक जीती हैं। जिस जिले (रायपुर) की कुल जनसंख्या आज 40 लाख से अधिक है, उसमें कुल 1883 व्यक्ति ही 90 वर्ष की आयु पाये, जिनमें से 767 पुरुष और 1116 महिलायें हों- यह भी कोई उत्साहवर्धक स्थिति नहीं है- चूंकि यद्यपि हम बुढ़ापे की कमजोरियों से दूर रहना चाहते हैं, पर जीना तो 100 वर्ष तक चाहते हैं। सूखे का असर- छत्तीसगढ़ क्षेत्र में वर्ष 72-73 में पड़ा सूखा भी जनसंख्या पर अपनी झलक छोड़ गया। यहां 74 में जन्मे लोगों की संख्या जो अब 37 वर्ष के हैं 59000 से घटकर 43000 कुछ पर आ गई। समेकित बाल विकास योजना का शुभारम्भ- सन् 1974 में ही भारत के कई हिस्सों में समेकित बाल विकास योजना (आईसीडीएस) लागू की गई।
इसके तहत 0 से 6 वर्ष के आयु समूह के बच्चों को पूरक पोषण आहार तथा अन्य 5 उपयोगी मशविरा या सामान शासन की ओर से प्रदान किया जाता है। इस योजना से रायुपर क्षेत्र को भी कुछ लाभ हुआ है, जबकि 36, 35, 34, 33 व 32 वर्षीय सभी जनसंख्या 43000 से ऊपर ही रही। इन वर्षों में अर्थात् सन् 75, 76, 77, 78 व 79 में नये-नये विकास खंडों में इस योजना का विस्तार किया गया।
सेवानिवृत्ति की आयु वाले- 2011 की जनगणना में रायपुर में 60 वर्षीय लोगों की संख्या मात्र 50,932 पाई गई है। इनमें 23288 पुरुष व 27644 स्त्रियां हैं। गांवों में इनमें से कुल 35602 लोग रहते पाये गये, जिनमें से 16314 पुरुष व 19288 स्त्रियां हंै। शहरों में कुल 15330 लोगों में से 6974 पुरुष व 8356 स्त्रियां पाई गईं। सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने, बेहतर कसरत, बेहतर खान-पान और साथ ही साथ सकारात्मक सोच और समाजसेवा-ये सभी इस आयु वर्ग के लोगों की संख्या बहुत बढ़ा सकते हैं। जीवन के प्रति एक दृष्टिकोण यह भी है कि मनुष्य के जीवन का एक अहम् हिस्सा बच्चे से मनुष्य बनने, गृहस्थी की जिम्मेदारियां निभाने में चला जाता है। असली अपनी तरह से जीवन जीने का अवसर तो साठ वर्ष के बाद ही आता है।

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