असम के नतीजे तय करेंगे मोदी की लोकप्रियता

2017 के विधानसभा चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तरप्रदेश होगा। हालांकि वहां भाजपा की सरकार नहीं है लेकिन 2014 के चुनावों में भाजपा ने 71 और उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल ने 2 सीट जीतकर यह साबित कर दिया था कि उत्तर प्रदेश में वह बहुत मजबूत है।

शेष नारायण सिंह
पांच विधान सभाओं के चुनावों के नतीजे एक महीने के अन्दर आ जायेगें। असम, बंगाल, तमिलनाडु और केरल में सत्ताधारी पार्टियों के चुनाव हार जाने की संभावना पर चर्चा शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल के चुनावों के बारे में लेफ्ट फ्रंट-कांग्रेस जोत के आकार लेने के पहले ममता बनर्जी अजेय मानी जा रही थीं लेकिन अब उनकी कुर्सी भी डगमगा रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान कर दिया है कि जिस तरीके से तीसरे दौर के मतदान के दिन पश्चिम बंगाल के चारों जिलों में हिंसा का आतंक छाया रहा वह इस बात का संकेत है कि दीदी हार मान चुकी हैं। 19 मई के नतीजों में अगर भाजपा असम में सरकार बना लेती है तो नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ेगी लेकिन अगर नहीं भी बनाती तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि 2016 के विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में भाजपा के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है।
लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। पंजाब में उनकी सरकार है जो बहुत ही अलोकप्रिय हो गई है। भाजपा के पार्टनर, अकाली दल वाले चारों तरफ आलोचना के शिकार हो रहे हैं। हालांकि इस बात की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि चुनाव के पहले भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व अकाली दल से पल्ला झाडऩे का फैसला ले ले क्योंकि केंद्र की सरकार चलाने के लिए उनको अकाली दल की कोई जरूरत नहीं है। चर्चा शुरू हो गयी है कि अगर पंजाब में गठबंधन से अलग हो जाएं तो प्रकाश सिंह बादल परिवार के भ्रष्टाचार और कथित ड्रग कारोबार के आरोपों से किनारा किया जा सकता है। बहरहाल पंजाब की राजनीति का स्वरूप मौजूदा चुनावों के बाद तय होना शुरु होगा।
2017 के विधानसभा चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तरप्रदेश होगा। हालांकि वहां भाजपा की सरकार नहीं है लेकिन 2014 के चुनावों में भाजपा ने 71 और उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल ने 2 सीट जीतकर यह साबित कर दिया था कि उत्तर प्रदेश में वह बहुत मजबूत है। उस जीत के बाद, वर्तमान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तरप्रदेश के इंचार्ज के रूप में बहुत नाम कमाया और आज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उत्तर प्रदेश में उनकी रुचि होना स्वाभाविक भी है। अभी तक माना जा रहा था कि 2017 में भाजपा को राज्य में बड़ी जीत मिलेगी लेकिन अब भाजपा वाले कहने लगे हैं कि राज्य में समाजवादी पार्टी की तो हार होगी लेकिन सत्ता मायावती के हाथ चली जायेगी। मायावती को अगला मुख्यमंत्री मानने वाले तो समाजवादी पार्टी में भी हैं। नई दिल्ली में पार्टी से जुड़े कई लोगों ने इस बात को बहुत भरोसे के साथ बताया कि उनकी पार्टी हार रही है। यह महत्वपूर्ण संकेत था लेकिन जब उनकी इस भविष्यवाणी को सच्चाई की कसौटी पर जांचा गया तो पता लगा कि उनको गुस्सा अपनी पार्टी से नहीं, उस मुख्यमंत्री से है जो आजकल उन लोगों के धंधे पानी की सिफारिशों को नजरअंदाज कर रहा है। लेकिन दिल्ली में रहने वालों को यह अक्सर सुनने को मिल जाता है कि उत्तर प्रदेश में बहन जी की सरकार आ रही है। जाहिर है इन बयानों को जमीनी धरातल पर जांच करने की जरूरत थी। इसके लिए पिछले एक महीने में इस संवाददाता ने उत्तर प्रदेश की तीन यात्राएं कीं। क्योंकि राजनीति की रिपोर्टिंग करने वाला कोई भी पत्रकार बता देगा कि बिना गांवों, शहरों और सडक़ों पर घूमे बिलकुल अंदाज नहीं लगता कि राज्य की राजनीतिक हवा किस तरफ को बह रही है।
उत्तरप्रदेश की इन तीन यात्राओं में एक पूर्वी उत्तरप्रदेश, दूसरी लखनऊ और तीसरी बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित इलाकों की है। बुंदेलखंड में तो राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बातचीत भी हुई। अखिलेश यादव ने दावा किया कि बुन्देलखंड में उन्होंने विकास को प्राथमिकता बनाया है लेकिन फिलहाल उनका मिशन अगले तीन महीने तक उन लोगों के घरों में राशन पहुंचाना है जिनके यहां सूखे के कारण खाने के लिए कुछ भी नहीं है। यह सारा राशन मुफ्त में दिया जा रहा है। ललितपुर जिले के लोगों से बात हुई तो पता चला कि वहां विकास की बहुत सारी योजनायें भी चल रही हैं। बांध,नहर, तालाब आदि पर काम इस सरकार के आने के पहले से भी हो रहा है लेकिन फिलहाल प्राथमिकता लोगों को भूख से मरने से बचाना है और अखिलेश यादव की सरकार की हर घर में आटा, दाल, चावल, नमक और तेल पंहुचाने की जो योजना है। वह साफ नकार आती है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जब पूछा गया कि बुंदेलखंड पर इतना ज्यादा ध्यान क्यों दे रहे हैं, क्या इस इलाके से 2017 और 2019 में चुनावी लाभ लेने की मंशा है तो उन्होंने कहा कि इस वक्त जो हालात हैं, उसमें चुनाव की बात का कोई मतलब नहीं है। लोगों को अगले तीन महीने तक भूख से बचाना उनकी प्राथमिकता है। चुनाव की बाद में देखी जायेगी। कोई भी नेता किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को चुनावी मुद्दा नहीं बनाता लेकिन साल भर के अन्दर होने वाले चुनावों पर इसका असर पड़ता ज़रूर है। बुंदेलखंड कांग्रेस, भाजपा और बहुजन समाज पार्टी का प्रभाव क्षेत्र रहा है।

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