अव्यवस्थाओं से कराह रहा शहर, अफसर कर रहे मौज

  • दस्ते की सूचना मिलते ही रफूचक्कर हो जाते हैं अवैध मण्डी वाले
  • दस्ते के जाते ही फिर गुलजार हो जाती हैं मण्डियां

Capture 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। निशातगंज ब्रिज के नीचे अव्यवस्था का आलम जस का तस है। चौराहे से लेकर क्रासिंग और क्रासिंग से कुछ दूरी तक सडक़ किनारे लगने वाले ठेले बरसों से लग रहे हैं। अभियान चलाये जाने पर कुछ हटते हैं, तो नए आ जाते हैं। दुकानदार बदल जाते हैं, लेकिन अव्यवस्था नहीं। सडक़ के दोनों ओर वाहन भी कतार से खड़े रहते हैं, पर उन्हें हटाने के लिए कोई भी जुम्मस नहीं उठाता है।
ऐसा ही कुछ हाल डालीगंज के आस-पास कारगिल शहीद पार्क व शहीद स्मारक पार्क के सामने लगने वाली अवैध मंडी का भी है। यहां बरसों से लग रही फलों की दुकानों के लिए कई बार अभियान भी चला, पर स्थिति जस की तस है। अब ऐसा नहीं कि पुलिस व नगर निगम कुछ करते भी नहीं। यह ठेले कई बार हटाए गए। दुकानदारों को पब्लिक के सामने बहुत डांट भी पड़ी। लेकिन दूसरे ही दिन ठेले ठीक उसी स्थान पर फिर सज गए। महीनों बीत गए कोई टोकने नहीं आया। अफसर जागे तो अभियान चला। ठेले हटाए गए और फिर वहीं लग गए। अब यह सब किसी खास व्यवस्था के तहत है या किसी की मेहरबानी, आसानी से समझा जा सकता है लेकिन आला अफसर बिल्कुल अनभिज्ञ बने हुए हैं।
निशातगंज ब्रिज की नीचे चल रही अवैध मण्डी

निशातगंज ब्रिज के नीचे भी कुछ ऐसा ही हाल देखने को मिलता है। ब्रिज के नीचे लाइन से फलों की दुकानें व सब्जी ठेले वालों की दुकानें सज हुई हैं। लोगों के लिए उधर से निकलना दूभर हो जाता है। वहीं पास में ही क्रासिंग होने की वजह से जब क्रासिंग का फाटक बंद होता है, तो लंबा जाम लग जाता है। ऊपर से इन अवैध मंडियों की वजह से जाम निशातगंज चौराहे तक पहुंंंच जाता है। ऐसा नहीं है, अवैध मंडी के खिलाफ अभियान नहीं चला, पर यह मंडी वाले दूसरे दिन फिर अपनी जगहों पर आकर जम जाते हैं। वहीं कुछ लोगों का आरोप है कि निगम के ही कुछ कर्मचारी इन मंडी वालों से मिले हैं, जो अभियान चलने से पहले ही इन लोगों को सूचना दे देते हैं। इसलिए मंडी में ठेला लगाने वाले अलर्ट हो जाते हैं, वह टीम के पहुंचने से पहले ही रफूचक्कर हो जाते हैं।
…फिर आकर जम गए

डालीगंज समीप स्थित कारगिल शहीद पार्क के सामने अवैध तरीके से लग रही फल मंडी अभी कुछ दिन पहले ही अभियान चलाकर हटाई गई थी। किन्तु वह अभियान के दूसरे दिन से ही दोबारा वहां आकर जमा हो गए। इन फल वालों को किसी का भी डर नहीं है। कारण यह भी है कि इनकी कोई पक्की दुकान होती नहीं है। यह ज्यादातर ठेले पर या फिर सडक़ किनारे लकड़ी की पेटी, टाट की बोरी व गत्ते पर लगाते हैं, जिससे वह कभी भी आसानी से भाग सकें और उनका ज्यादा नुकसान न हो। इसलिए ये बेखौफ होकर दुकानदारी करते हैं। यहां वर्षों से जमे हुए हैं। उधर पुलिस की मिलीभगत भी सामने आती है। क्षेत्रीय पुलिस वाले इनसे हफ्ता वसूलते हैं, जिस कारण इनके हौसले बुलंद रहते हैं और शहर में जाम लगे या फिर आम लोगों को कोई परेशानी हो, इससे कोई मतलब नहीं है।

दस्ता पहुंचने से पहले ही रफूचक्कर हो जाते हैं अतिक्रमणकारी

ऐसा नहीं कि कभी अधिकारियों ने इस ओर रुख नहीं किया। कई बार नगर निगम का दस्ता आया। पुलिस ने भी दुकानों को हटवाने का रुख किया, लेकिन दस्ता आने से पहले ही हर बार उसके आने की सूचना दुकानदारों तक पहुंच गई। बस, फिर कुछ देर के लिए भगदड़ मची। दुकानदार अपने ठेले व सामान लेकर चलते बने। लगा कि बड़ी कार्रवाई हो गई। मगर, कुछ घंटों बाद जो दुकान वहां से हटी थी, फिर सज गई। दुकानदारों में न अपनी जगह को लेकर कोई विवाद और न ही कार्रवाई का कोई डर। दुकानदारों में जगह को लेकर भी कोई मनमुटाव क्यों नहीं हुआ। यानी उनकी जगह तय है। पर यह जगह किसने तय की। एक दुकानदार की मानें तो दस्ता आने से पहले उसकी सूचना कुछ कर्मचारी ही उन तक पहुंचाते हैं। यानी कार्रवाई के नाम पर ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ की कहावत चरितार्थ होती है। पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों को इस ओर भी जरा सोचना होगा। अधीनस्थों से उन कार्रवाई का हिसाब भी मांगना होगा, जो औचक दस्ता भेजकर कराई गईं हैं।

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