अविवाहित मां को कानूनी पहचान

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बच्चे से सरोकार न रखने वाले पिता के अधिकारों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है नाबालिग बच्चे का कल्याण।
अच्छी बात यह है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत से अपना पहला आदेश वापस लेने को कहा है।

देsanjay sharma editor5श की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे पर मां के नैसर्गिक हक पर मुहर लगाते हुए अविवाहित मां को कानूनी पहचान दे दी है। कोर्ट ने अपने दूरगामी परिणाम वाले ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि अविवाहित मां को बच्चे का संरक्षक बनने के लिए पिता से मंजूरी लेना जरूरी नहीं। इतना ही नहीं कोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर कोई अविवाहित या अकेली रह रही मां बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करती है तो सिर्फ एक हलफनामा देने पर उसे जन्म प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले में महिला को ऐसा हक प्रदान करने की बात कही है जिसके कारण एक नहीं, कई-कई सामाजिक रूढिय़ों और वर्जनाओं पर एक साथ चोट पडऩी तय है और भविष्य में एक प्रगतिशील समाज की राह सुनिश्चित लगती है।
भारत में लंबे समय से चली आ रही पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था ने बच्चों को पुरुष की संपत्ति बना रखा था, भले ही वह पिता का दायित्व निभाने को तैयार हो या नहीं। ऐसे में मां की ममता की तो बात ही छोडि़ए उसके आत्मसम्मान तक की बात कोई नहीं सोचता था। हमारे देश में पुरुष द्वारा महिला से विवाह न कर उसे अनब्याही मां बनाने के बाद छोड़ देने के कई उदाहरण मिल जाएंगे। पुरुष तो अपनी जिम्मेदारी से बच निकलता है, पर सारी परेशानी बेचारी महिला और उस बच्चेेे के हिस्से आ जाती है। समाज के डर की वजह से वह अपने कलेजे पर पत्थर रखने को या तो समय से पहले बच्चे को मारने को मजबूर होती है, नहीं तो गटर या झाड़ी के बीच डालने को।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बच्चे से सरोकार न रखने वाले पिता के अधिकारों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है नाबालिग बच्चे का कल्याण। अच्छी बात यह है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत से अपना पहला आदेश वापस लेने को कहा है। दिल्ली की एक मां को निचले कोर्ट के बाद 2011 में हाई कोर्ट से भी निराशा ही हाथ लगी थी। इसके बाद उसे सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाना पड़ा। यह मां अपने बच्चे के जैविक पिता का नाम उसके साथ नहीं जोडऩा चाहती। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब कोई भी सिंगल अभिभाव, भले ही उसकी स्थिति एक अविवाहित मां की ही क्यों न हो। एक हलफनामा देकर अपने बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट हासिल कर सकती है। इस निर्णय का सबसे गौरतलब पहलू यह है कि अब सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बर्थ रजिस्ट्रेशन न होने की वजह से किसी नागरिक को परेशान न होना पड़े। कोर्ट ने जन्म पंजीकरण करना सरकार का कर्तव्य बताया है। मां की ममता को इस निर्णय के जरिए एक बड़ा अर्थ मिला है क्योंकि गैरजिम्मेदार पिता को सार्वजनिक रूप से अधिसूचित किए जाने की जरूरत से अलग कर दिया गया है।

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