अल्पसंख्यक उत्पीडऩ बना सरकार के विरोध का बहाना – राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

Captureक्या हिन्दुत्ववादी उग्रता का प्रचार अतिरेक अल्पसंख्यकों में उन्मादी अभिव्यक्ति का कारण बन रहा है। यह प्रश्न इसलिए किया जाने लगा है क्योंकि कतिपय चोरी या किसी आस्था के भवन पर पत्थरबाजी की घटनाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस ढंग से उछाला जा रहा है उससे यह आभास होता है कि विश्व भर में सबसे अधिक अल्पसंख्यक कहीं असुरक्षित हैं तो वह भारत है। क्या यह सही आकलन है? और क्या ईसाई और इस्लाम मतावलम्बियों को भारत में आम नागरिकों के समान मिले संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। कुछ चोर उच्चकों की गतिविधियों का हिन्दुत्ववादी संगठनों पर आरोप मढऩे का प्रयास एक गहरी साजिश के तहत किया जा रहा है।
इसी प्रकार असाद्दुदीन ओवैसी, अरशद मदनी और आजम खान में मुस्लिम नेता बनने की होड़ में उग्र अभिव्यक्ति की स्पर्धा माहौल को बिगाड़ रही है। अल्पसंख्यकों का भारत में उत्पीडऩ बढ़ रहा है सबसे पहले इस बात को तब उछाला गया, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह आरोप और अधिक प्रकोपित ढंग से शायद इसलिए उछाला जा रहा है क्योंकि वर्षों तक उन पर बिना सबूत उस दंगे को उभारने का आरोप लगाया गया जो गोधरा रेलवे स्टेशन पर एक रेल बोगी में आग लगाकर 69 कारसेवकों को जीवित जला देने के अत्यंत नृशंस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप घटित हुआ था और जिसको नियंत्रित करने के लिए तत्कालीन मोदी सरकार ने जो सुरक्षात्मक कदम उठाये थे, उसमें अब तक के किसी भी दंगे में पुलिस की गोली से मरने वाले हिन्दुओं की संख्या सर्वाधिक होने के बावजूद, उसका संज्ञान नहीं लिया गया।
जिस हिडन एजेंडा शब्दावली का अविष्कार वाजपेयी शासन के संदर्भ किया गया था, उसे ही मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद फिर से दोहराया जाने लगा है। क्यों? क्योंकि सरकार पर कुशासन, भ्रष्टाचार आदि के आरोप जो आमतौर पर प्रत्येक कांग्रेसी सरकार के साथ नत्थी हैं, उसका कोई अवसर न तो वाजपेयी की सरकार के खिलाफ मिला और न अब मिल पा रहा है। जिन्हें सरकार का विरोध करना है, उनके लिए अल्पसंख्यक उत्पीडऩ भारतीय जनता पार्टी तथा संघ परिवार के संगठनों को बदनाम करने के लिए सर्वोत्तम हथियार समझ में आता है। यदि आंकड़ों में जायें तो जितने दंगे कांग्रेस के शासनकाल में हुए और जितने देशहित विरोधी आचरण करने वाले उस काल में उभरे उसकी तुलना में भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में कुछ भी नहीं हुआ। अभी जिस हाशिमपुरा हत्याकांड में न्यायालय ने सभी आरोपियों को बरी किया है, उसमें पीएसी पर लोगों को घरों से निकालकर मार डालने और लाशों को नहर में फेंक देने जैसा आरोप भाजपा ही नहीं किसी भी गैर कांग्रेसी सरकार पर नहीं लगाया गया है। यह घटना केंद्र में और राज्य दोनों में कांग्रेसी सरकार रहते घटित हुई है। मुजफ्फरनगर का दंगा भाजपा नहीं राज्य में सपा और केंद्र में कांग्रेसी सरकार के समय में हुआ है। गुजरात के दंगे के संदर्भ में भी अनेक कल्पित आरोपों की फेहरिस्त में भी यह आरोप शामिल नहीं है कि सरकार या सशस्त्र बल ने अल्पसंख्यकों पर हमला किया। लेकिन भाजपा को सत्ता में आने से रोकने या सत्ता में आने के बाद बदनाम करने के लिए उसके विरोधियों के पास एक ही मुद्दा है अल्पसंख्यक उत्पीडऩ। चोरी करने वाले भी हिन्दुत्ववादी या दक्षिणपंथी अर्थात संघ द्वारा प्रेरित बताने की होड़ केवल राजनीतिक असरवादी लोगों के बीच नहीं है, प्रबुद्ध समझे जाने वाले लोग भी इस संदर्भ में भ्रमित होकर जो अभिव्यक्ति कर रहे हैं, उसके दुष्परिणाम की ओर उनका ध्यान नहीं जा रहा है। कुछ अवांछनीय तत्वों की हरकतों को दक्षिण की संज्ञा प्रदान करने की अभिव्यक्ति का उपयोग सेवा से धर्मान्तरण अथवा शस्त्र से या छल से धर्मान्तरण करने वालों को जिस रूप में मुखरित होने का अवसर प्रदान कर रहा है, वह बहुत खतरनाक दिशा में बढ़ते जाने का संदेश दे रहा है। पाकिस्तान हमारा पड़ोसी देश है। वहां हिन्दुओं और ईसाइयों का जैसा उत्पीडऩ हुआ है और हो रहा है उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिल सकती। यहीं नहीं तो वहां की सत्ता संभालने वाले वर्ग ने इस्लामी आस्था वाले तमाम संप्रदायों को न केवल गैर इस्लामी घोषित कर दिया है बल्कि उनका कत्लेआम जारी है।

क्या है अरब देशों में जहां अपनी आत्मिक आस्था के अनुसार गैर इस्लामी लोगों के द्वारा अपने घर के भीतर भी अनुष्ठान करना अपराध की श्रेणी में रखा गया है और उन्हें मृत्यु दंड दिया गया है। जो मानवाधिकार के लम्बरदार हैं क्या उन्होंने कभी यह भी विचार किया है चाहे अमेरिका हो या अफ्रीका ईसाई मतावलम्बी लोगों ने स्थानीय लोगों पर कैसा अत्याचार किया है। दुनिया भर में भारत एक ऐसा देश है और सदैव रहा है जहां अपनी आस्था के अनुसार आचरण करने का सभी को समान अवसर की गारंटी मिली है। यह गारंटी संविधान में गारंटी देने के पूर्व सनातन काल से चली आ रही है। यहां न तो कोई नादिरशाह हुआ न अब्दालीन मोहम्मद गौरी व गजनवी जिसने तलवार के बल पर आस्था परिवर्तन कराया। और न कोई ऐसी संस्था जिसने ईसाई मिशनरियों के समान निर्धनता वाले समूह को लक्ष्य कर ”सेवा” के नाम पर धर्मान्तरण किया।

भारत के जिन मनीषियों ने विदेशों या इस देश में भी अपने अभिमत का प्रचार किया है, वह उस समूह या व्यक्ति के साथ जिन्हें प्रबुद्ध माना गया है। हमारा यह आचरण आज भी जारी है यही कारण है कि पीडि़त मानवता को प्रकृति के शोषण के कारण-जिन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है, उससे उबरने का एकमात्र तरीका भारत के प्रकृति के साथ तादात्म को माना जा रहा है। यह पक्ष ऐसा है जिसका बहुत विसतार किया जा रहा है। विदेशी ईसाई मिशनरियों की भेदभाव मुक्त आचरण के खिलाफ स्वदेशी ईसाई संगठनों का अभियान उनके आचरण की गवाही देता है।

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