अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक पर तीन साल से चल रही है जांच, अब तक नहीं हुई कार्रवाई

  • डॉ. योगेन्द्र के खिलाफ जांच तो दूर कुछ कहने से भी डरते हैं अधिकारी

वीरेन्द्र पाण्डेय
Captureलखनऊ। उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग के अन्र्तगत आने वाले अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह के खिलाफ पिछले तीन साल से चल रही विभागीय जांच आज तक चल रही है। डॉ. सिंह के खिलाफ शासन के अनुसचिव द्वारा गंभीर वित्तीय अनियमितता के चलते वर्ष 2013 में सतर्कता जांच के आदेश दिये गये थे। लेकिन बाद में अपने प्रभाव के चलते डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने सतर्कता जांच को विभागीय जांच में तब्दील करा लिया था। इस जांच में पहले इनको निलंबित भी किया गया और उसके बाद बहाली भी हो गयी थी। वित्तीय अनियमितताओं की यह जांच अभी भी मंडलायुक्त फैजाबाद के पास है।
इस विभाग के लोगों का कहना है कि योगेन्द्र प्रताप सिंह के प्रभाव का ही९ कमाल है कि इनके खिलाफ जांच आगे नहीं बढ़ रही है। एक विभागीय अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि विभाग में डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह का इतना खौफ है कि कोई भी अधिकारी बोलने से डरता है। डॉ. सिंह इतने प्रभावशाली है कि 2013 में आयोजित कुंभ मेले में मनमाने तरीके से संस्थान के लाखों रुपये खर्च कर दिये गए, जिसकी प्रतिपूर्ति नगर विकास द्वारा नहीं की गयी। इसकी जांच तत्कालीन प्रमुख सचिव संस्कृति आईएएस राजन शुक्ल द्वारा करायी गयी थी, जिसमें तत्कालीन अपर निदेशक संस्कृति निदेशालय ने अपने पत्र संख्या 788 दिनांक 11 -7-2014 की जांच में डॉ.योगेन्द्र प्रताप सिंह को दोषी ठहराया था। लेकिन दोषी ठहराये जाने के बाद भी डॉ. योगेन्द्र पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा सकी।
निदेशक अयोध्या शोध संस्थान के बैठते जवाहर भवन में
डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह अप्रैल 2002 से आयोध्या शोध संस्थान के निदेशक पद पर तैनात हैं। लेकिन अयोध्या स्थित अपने कार्यालय में कभी-कभार ही जाते हैं। इन्होंने अयोध्या जाने की बजाय जवाहर भवन के नवें तल पर ही अपना कार्यालय बना रखा है। वहीं से सारा शोध कार्य करते हैं, जबकि इनका कार्यक्षेत्र आयोध्या में है और इनका सारा स्टाफ भी वहीं बैठता है।

सीबीआई जांच की मांग

डॉ. योगेन्द्र को जिम्मेदार दी गयी थी राम की जन्म भूमि अयोध्या के संबंध में शोध कार्य करने की लेकिन साहब ने अयोध्या के संबंध में शोधकार्य करने के बजाय अपनी झोली भरनी शुरू कर दी। इसका नतीजा ये हुआ कि विभाग में तब से कोई शोध कार्य ही नहीं हुआ। इसके चलते संस्थान के निदेशक डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह के द्वारा किये गये भ्रष्टï कार्यों की सीबीआई जांच की मांग राज्यपाल से की गयी है। शिकायतकर्ता ने राज्यपाल से सीबीआई जांच के लिए कई बिन्दुओं को आधार बनाया है, जिसमें डॉ. सिंह के खिलाफ हो रही जांचों से लेकर उनके द्वारा की जा रही अनिमितता को आधार बनाया गया है।
बगैर शासन की अनुमति के दो पद पर काम कर रहे डॉ. योगेन्द्र डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ के महानगर स्थित बेकन एजुकेशनल सोसाइटी के सचिव पद पर बिना शासन की अनुमति के कार्यरत हैं। सूत्रों की मानें तो डॉ.सिंह की नियुक्ति 2000 में सांस्कृति कार्य निदेशालय में तत्कालीन सचिव संस्कृति उत्तर प्रदेश शासन द्वारा प्रतिनियुक्ति पर बिना कार्मिक विभाग की सहमति लिये हुए तथा बिना नियुक्ति की प्रक्रिया का पालन करते हुए की गयी है। जबकि प्रतिनियुक्ति पर उसी व्यक्ति को नियुक्त किया जा सकता है, जो शासकीय सेवा में किसी पद पर हो।

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