अमेरिकी लालच क्रांति को रोकने का सबसे सशक्त माध्यम भारतीय चिन्तन

विश्व भर में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को प्रचारित करने की जरूरत
Captureपन्द्रह दिवसीय विद्यान्त परिसंवाद का समापन

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एके शर्मा ने भारतीय चिन्तन को अमेरिकी लालच क्रांति को रोकने का सबसे सशक्त माध्यम बताया है। इसका प्रमुख कारण भारतीय चिन्तन में न्यूनतम भोग का विचार और प्राकृतिक शक्तियों के माध्यम से शान्ति की कामना है। इसलिए प्राचीन ऋषियों के विचारों को प्रमुखता से समझने और उनको बढ़ावा देने की जरूरत है।
प्रोफेसर शर्मा विद्यान्त कालेज में 15 दिवसीय परिसंवाद समापन के दौरान उपस्थित लोगों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज परम्परागत रूप में प्रकृति के प्रति आदर भाव रखता है। हमारे यहां से ऋषियों ने प्रकृति में देवत्व देखा और उसकी के अनुरूप प्राकृति शक्तियों का सम्मान कर पूजा पाठ शुरू कर दिया। देश के लोगों ने विश्व शांति का सपना देखा। इस सपने को विश्व भर के देशों ने स्वीकारा भी है। ऐसे में विश्व के बड़े हिस्से को भय, भूख, गरीबी, बीमारी और पेयजल आदि की समस्या से निजात दिलाने के लिए अमेरिकी लालच क्रांति के रथ को रोकना जरूरी है। इसमें भारतीय चिन्तन सबसे प्रभावी साबित हो सकता है। इसका सबसे प्रमुख कारण विश्व में भारत की जनसंख्या में भारत का हिस्सा सोलह प्रतिशत है, जबकि क्षेत्रफल में हमारी हिस्सेदारी दो प्रतिशत है। गौरतलब हो कि विश्व के पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने मे भारत का योगदान बहुत कम है। लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में अमेरिका सबसे ऊपर है, उसकी आबादी तीस करोड़ है। वह कास्मेटिक, पफर््यूम पर जितना खर्च करता है उससे विकासशील और अविकसित देशों का कायाकल्प हो सकता है।
इसके साथ ही पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली सर्वाधिक नुकसानदेह गैसों का उत्सर्जन अमेरिका करता है। इस पर नियंत्रण लगाने के लिए विकसित देश पहल करेंगे तभी सुधार हो सकता है। उन्हें अति उपभोगवाद की मानसिकता को बदलना होगा। इसके लिए विकसित देशों में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को जागृत करना होगा।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के निदेशक बृजेश चन्द्र ने कहा कि उदारवाद के इस दौर मेें भारतीय संस्कृति संक्रमण के दौर से गुजर रही है। इस संस्कृति के अधिकाश तत्व संस्कृत भाषा में लिखे हुए हैं। आधुनिक उदारवाद में संस्कृत के सामने भी अनेकों चुनौतियों को खड़ा किया गया है परन्तु मूल्य और मूल की रक्षा के बिना समस्या का समाधान सम्भव नहीं है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता शिवाशीष घोष, संचालन डॉ. विजय कर्ण, स्वागत आर. के. मिश्र, परिसंवाद विवरण डॉ. बृजेन्द्र पाण्डेय और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. दिलीप अग्निहोत्री ने किया।

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