अब तक के सबसे बुरे दौर में उच्च शिक्षा

अधिकांश निजी संस्थान उच्च शिक्षा में छाई मंदी से इस कदर हताश और निराश हो चुके हैं कि अब वो कुछ नया नहीं करना चाहते, न ही उनके पास छात्रों को स्किल्ड बनाने की कोई कार्ययोजना है। दूसरी तरफ जो संस्थान अच्छी और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और स्किल ट्रेनिंग देने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें नियम-कानून का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

शशांक द्विवेदीे
देश में इस समय तकनीकी और उच्च शिक्षा सबसे बुरे दौर में है। पिछले पाँच साल से उच्च शिक्षा का समूचा ढांचा चरमरा गया, लेकिन किसी सरकार ने इसके लिए कुछ नहीं किया। यूपीए के शासनकाल में 2010 से तकनीकी शिक्षा में गुणवत्ता की नींव कमजोर होने लगी थी और देश भर में इंजीनियरिंग सहित कई तकनीकी कोर्सों में लाखों सीटें खाली रहने लगी थीं, जिसका आंकड़ा साल दर साल बढ़ता गया, लेकिन केंद्र सरकार ने इतने संवेदनशील मुद्दे पर कुछ नहीं किया। पिछले एक साल से एनडीए सरकार ने भी इस स्थिति से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। हालात यह है वर्तमान सत्र में पूरे देश में तकनीकी और उच्च शिक्षा में 7 लाख से ज्यादा सीटें खाली हंै, जुलाई-अगस्त से नया सत्र शुरू होने वाला है और यह आंकड़ा अभी और भी बढऩे वाला है। कहने का मतलब यह कि साल-दर-साल स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। तकनीकी और इंजीनियरिंग स्नातकों में बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है।
सरकार का सारा ध्यान सिर्फ कुछ सरकारी युनिवर्सिटीज, आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी जैसे मु_ीभर सरकारी संस्थानों पर है। जबकि देश भर में 95 प्रतिशत युवा निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों से शिक्षा लेकर निकलते हंै और सीधी सी बात है अगर इन 95 प्रतिशत छात्रों पर कोई संकट होगा तो वो पूरे देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक स्थिति को भी नुकसान पहुंचाएगा। सिर्फ 5 प्रतिशत सरकारी संस्थानों की बदौलत विकसित भारत का सपना साकार नहीं हो सकता। उच्च शिक्षा में जो-जो मौजूदा संकट है, उसे समझने के लिए सबसे पहले इसकी संरचना को समझना होगा। मसलन एक तरफ सरकारी संस्थान हैं, दूसरी तरफ निजी संस्थान और विश्वविद्यालय है। निजी संस्थानें भी दो तरह के हैं। एक वह है जो छात्रों को डिग्री के साथ-साथ हुनर भी देते हैं जिससे वो रोजगार प्राप्त कर सकें, ये संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं और उसके लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। ये छात्रों के स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देते हुए उन्हें उच्च स्तर की ट्रेनिंग मुहैया करा रहे हैं।
अधिकांश निजी संस्थान उच्च शिक्षा में छाई मंदी से इस कदर हताश और निराश हो चुके हैं कि अब वो कुछ नया नहीं करना चाहते, न ही उनके पास छात्रों को स्किल्ड बनाने की कोई कार्ययोजना है। दूसरी तरफ जो संस्थान अच्छी और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और स्किल ट्रेनिंग देने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें नियम-कानून का पाठ पढ़ाया जा रहा है। उन्हें तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है, मतलब वो स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पा रहे हैं। यूजीसी और एआईसीटीई के कई दशक पुराने क़ानून भी उन्हें ठीक से और स्वतंत्र रूप से काम करने की आजादी नहीं दे पा रहे हैं। कहने का मतलब यह कि जो संस्थान देश हित में, छात्र हित में कुछ इनोवेटिव फैसले ले रहे हैं, वो सरकारी लाल फीताशाही का शिकार हो रहे हंै। इसके साथ ही देश के सभी तकनीकी और उच्च शिक्षण संस्थानों में स्किल डेवलपमेंट को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाने की कोशिश होनी चाहिए। देश में स्किल्ड युवाओं की भारी संख्या में कमी है। पिछलें दिनों सीआईआई की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 के मुताबिक हर साल सवा करोड़ युवा रोजगार बाजार में आते हैं। आने वाले युवाओं में से 37 प्रतिशत ही रोजगार के काबिल होते हैं। यह आंकड़ा कम होने के बावजूद पिछले साल के 33 प्रतिशत के आंकड़े से ज्यादा है और संकेत देता है कि युवाओं को स्किल देने की दिशा में धीमी गति से ही काम हो रहा है। डिग्री और स्किल के बीच फासला बहुत बढ़ गया है। इतनी बड़ी मात्रा में पढ़े-लिखे इंजीनियरिंग बेरोजगारों की संख्या देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के लिए भी ठीक नहीं है।

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