अफसरों को धमकी देने की नौबत क्यों आई यूपी में?

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं। अनुभवहीनता अस्वाभाविक नहीं है और न सक्रोध अभिव्यक्ति। लेकिन विधानसभा चुनाव के समय उनकी ‘सौम्यता’ के फलस्वरूप समाजवादी पार्टी को मिली सफलता को प्रशासनिक अध्याय के चार वर्ष बीत जाने के बाद नौकरशाही को उनके द्वारा यह धमकी देना कि यदि वे (अखिलेश) बेरोजगार होंगे तो नौकरशाही को उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा, जहां इस बात का सबूत है कि नित्य विकास के नए आयाम का आगाज करने के दावे घोषणा से अधिक कुछ भी नहीं हैं। वहीं इस बात का भी सबूत है कि राजनीतिक दलों और उसके नेताओं की ओर से चुनाव में अपनी करनी का फल भुगतने की जिम्मेदारी दूसरों पर डालने की प्रक्रिया में चढ़ाव का दायरा बढ़ता जा रहा है।
राजनीतिक गैर जिम्मेदारी का उत्तर प्रदेश से अधिक नग्न स्वरूप शायद ही कहीं और प्रगट हो रहा हो। यदि यह कहा जाये कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की जकडऩ में राजनीतिक निर्णयों से उत्पन्न प्रशासनिक अराजकता देश में सबसे अधिक प्रदूषण फैला रही है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कतिपय मामले में न्यायालयों के निर्णय और भ्रष्टाचार के लिए घिरे नौकरशाह को दोनों ही दलों की सरकारों द्वारा प्रदत्त संरक्षण में समानता और कर्तव्यपालन के लिए नियमानुसार काम करने वालों को प्रताडि़त कर राजनीतिक पदधारकों की सम्पदा में दायित्व संभालने के पूर्व से कई हजार गुना की वृद्धि इसका जीता जागता सबूत है। बसपा सरकार ने जिस एक अधिकारी को पनपाया, सपा उसे संरक्षण देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गई।
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार की पक्षपातपूर्ण नियुक्तियों से प्रभावित संस्थाओं के प्रमुखों को पैदल करके जो महत्वपूर्ण कदम उठाया है उसमें चयन की सर्वोच्च प्राथमिकता वाली संस्था लोक सेवा आयोग तक शामिल है जिसके अध्यक्ष, सचिव तथा सदस्यों को उसने अपात्र घोषित कर दिया। क्या इसके लिए नौकरशाही जिम्मेदार है। रंगदारी वसूलने, बिना कर दिए महत्वपूर्ण मार्गों पर परिवहन सेवा चलाने, लोगों की सम्पत्ति पर कब्जा करने में जो अगुवाई कर रहे हैं उन्हें रोकने पर दण्डित होने वाली नौकरशाही क्या राजनीतिक लोगों की छवि के लिए जिम्मेदार है।
अखिलेश यादव ने ‘रोजगार’ छिनने पर नौकरशाही को परिणाम भुगतने की जो धमकी दी है, वह उनकी राजनीतिक अभिभावकों के आचरण से उत्पन्न खीझ भी हो सकती है लेकिन इसके साथ ही इस बात की संभावना का आंकलन भी कि आगामी 2016 के चुनाव परिणाम क्या होने वाले हैं। राजनीति करने वालों में आत्मचिन्तन का अभाव होता जा रहा है। जो स्पष्टवादी हैं उन्हें शत्रु समझा जाने लगा है फलत: उन चाटुकारों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है जो राजा की बैगन के बारे में धारणा के आधार पर कभी उसके सिर पर ताज देखते हैं तो कभी उसे बेगुण बताने लगते हैं। बाबा तुलसीदास ने भले ही कह दिया होगा कि ‘निन्दक नियरे राखिये आंगन कुट छवाय’ लेकिन हमारे आज के राजनीतिज्ञ जो नेता संबोधन सुनकर प्रगल्भित हो जाते हैं, ‘चापलूस नियरे राखिये ठेका पट्टा दिवाय’ में अधिक विश्वास करते हैं। इसलिए जो उनके चापलूसों का हित चिन्तक नहीं बन पाता वह नौकरशाही से उत्पीडि़त होता रहता है।
अखिलेश यादव युवा है नए हैं, इसलिए उन्होंने साफ-साफ लफ्जों में यह भड़ास निकाल दी है जो मंझे हुए हैं वह ‘शुगर कोटेड’ ढंग अपनाते हैं। प्रशासन संचालन के स्थायी तंत्र को कमजोर करने के इस प्रयास का सबसे ज्यादा दुष्परिणाम इसलिए हो रहा है क्योंकि वह जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं है और उत्पीडऩ के कारण उसमें राजनीतिक व्यक्तियों के प्रति घृणा बढ़ती जा रही है। उत्पीडऩ और घृणा के इस माहौल को अवाम भुगत रहा है। उत्तर प्रदेश का ही एक उदाहरण शायद स्थिति को और अधिक स्पष्ट कर सके। अखिलेश मंत्रिमंडल के एक ऐसे सदस्य हैं जिनको बहुत महत्वपूर्ण दायित्व भी प्राप्त है, जो मुख्यमंत्री की अवहेलना या अवमानना करने के किसी अवसर को हाथ से जाने नहीं देते। उनका नाम है आजम खां। ऐसे उदाहरणों की गिनती करना मुश्किल है जब उन्होंने यह साबित कर दिया कि मुख्यमंत्री की वे परवाह नहीं करते। लेकिन मुख्यमंत्री विवश हैं। क्यों? आजम खां एक ऐसे मंत्री हैं जिनका पूरा का पूरा निजी स्टाफ-जो सचिवालय प्रशासन से प्रदत्त होता है-उनके साथ काम करने से अलग हो गया और कोई भी सचिवालय प्रशासन का कर्मचारी आने के लिए तैयार नहीं है, जल निगम जिसके वे अध्यक्ष भी हैं, वे कर्मचारी उनके सचिवालय कार्यालय को चलाते हैं। मुख्यमंत्री ने बगावत करने वाले सचिवालय कर्मचारियों को बर्खास्त करने का आजम खां का आदेश तो नहीं माना, लेकिन एक वर्ष से ऊपर हो गया, उनकी कहीं तैनाती नहीं हो सकी, वे घर बैठे वेतन ले रहे हैं। अभी अखिलेश ने अपने मंत्रिमंडल में उलटफेर किया, उसमें कुछ मुस्लिम मंत्रियों को महत्व दिए जाने का इतना ही परिणाम नहीं हुआ कि आजम खां पूर्व के समान ही शपथ ग्रहण के समय अनुपस्थित रहे, अपितु उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को एक ऐसा पत्र लिखा जो उनके ‘त्यागपत्र’ देने के रूप में प्रचारित हुआ, उन्होंने उसका खंडन नहीं किया।

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