अफवाहों की गिरफ्त में भू-अधिग्रहण विधेयक

किसी किसान के द्वारा भूमि न देने के कारण राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण लम्बित अथवा अवरुद्ध हो गया हो, ऐसा एक भी उदाहरण आज तक देखने में नहीं आया है। आश्चर्य की बात है कि भूमि न देने के कारण राष्ट्रीय राजमार्ग की दिशा मोड़ देने का असाधारण उदाहरण हमें नागरिक अधिकारों के हनन के लिए बदनाम पड़ोसी देश चीन में देखने को मिलता है न कि भारत में।

डॉ. राजाराम त्रिपाठी
बड़ी पुरानी अन्तरराष्ट्रीय कहावत है कि ‘प्रेम और युद्ध’ में सब-कुछ जायज है। वर्तमान सन्दर्भ में इस कहावत का स्वरूप कुछ इस तरह बदल गया है ‘राजनीति अथवा सत्ता के खेल में सब-कुछ जायज है।’ यद्यपि असत्य अथवा अद्र्धसत्य का प्रयोग महाभारत का युद्ध जीतने के लिए धर्मनिष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर को भी करना पड़ा था।
‘अश्वत्थामा मरो, नरो वा कुंजरो’ कहकर अश्वत्थामा नामक हाथी के मरने पर द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा के मरने की अफवाह फैलाकर ही, द्रोणाचार्य का वध कर, महाभारत का युद्ध जीता जा सका था। यूं तो भूमि अधिग्रहण बिल ‘अन्धों का हाथी’’ बन गया है, इससे जुड़ा हर पक्ष इस अधिनियम की व्याख्या अपने लाभ के अनुरूप कर रहा है।
नई बात यह है कि वर्तमान में ‘नये भूमि अधिग्रहण बिल’ के पक्ष में जनमत बनाने के लिए ठीक उसी प्रकार अफवाहें फैलाई जा रही हैं। पिछले हफ्ते मीडिया में सरकारी विभागों के हवाले, एक खबर प्रमुखता से प्रकाशित की गई, जिसका आशय यह था, कि देश के राजमार्गों के निर्माण में ‘भूमि अधिग्रहण विधेयक बाधक’ हो रहा है। ‘केन्द्रीय सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय’ के हवाले जगह-जगह यह रोना-रोया जा रहा है, कि नया भूमि अधिग्रहण विधेयक पारित न होने के कारण देश में चहुं-दिस राजमार्गों का निर्माण ठप्प पड़ा है, जिससे देश का विकास गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि नवीन राजमार्गों का निर्माण भी इस विधेयक के लिए अटका पड़ा है। देश में ऐसा माहौल बनाया भी जा रहा है कि वर्तमान ‘भूमि अधिग्रहण विधेयक’ देश के विकास के लिए बेहद जरूरी है तथा इस विधेयक के पारित हुए बिना देश एक इंच आगे नहीं बढ़ पायेगा, दरअसल ये धारणा सरासर झूठ है। किसानों को विकास विरोधी साबित करने की सुनियोजित चाल के तहत ऐसी खबरें व्यापक रूप से फैलायी जा रही हैं। अब बिन्दुवार इस झूठ के पीछे छिपी सच्चाई पर विचार करें सबसे पहले यह जान लें कि राष्ट्रीय मार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण हेतु कहीं भी ऐसी कोई बाधा नहीं है जिसके लिए एक नया भूमि अधिग्रहण, विधेयक लाया जाए। वर्तमान में प्रभावी ‘राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम’, 1956 इस कार्य हेतु भली-भांति सक्षम एवं पर्याप्त है। विगत 60 वर्षों से राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए इस अधिनियम के तहत किसानों की भूमि पूरे देश में अधिग्रहित की जाती रही है। अपवादों को छोडक़र यह दावे से कहा जा सकता है कि किसानों ने राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भूमि देने में सदैव उदारता ही दिखाई है, यद्यपि ऐसे हजारों उदाहरण मौजूद हैं, जहां अपनी भूमि राष्ट्रीय राजमार्गों हेतु समर्पित करने के बावजूद, आज भी किसान समुचित मुआवजे से वंचित हैं। किसी किसान के द्वारा भूमि न देने के कारण राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण लम्बित अथवा अवरूद्ध हो गया हो, ऐसा एक भी उदाहरण आज तक देखने में नहीं आया है। आश्चर्य की बात है कि भूमि न देने के कारण राष्ट्रीय राजमार्ग की दिशा मोड़ देने का असाधारण उदाहरण हमें नागरिक अधिकारों के हनन के लिए बदनाम पड़ोसी देश चीन में देखने को मिलता है न कि भारत में।
‘राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम 1956 (1956 का 48वां)’ के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए आज भी सरकार राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए लगातार निर्बाध रूप से किसानों की भूमि अधिग्रहित कर रही है। उदाहरण के लिए देखें ‘भारत का राजपत्र’ संख्या 1293 नई दिल्ली, 22 जून, 2015 जिसके तहत राष्ट्रीय राजमार्ग 30 के लिए भूमि अधिग्रहित की जा रही है।

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