अपराधियों की पनाहगाह बन रही है राजधानी

गैर राज्यों और जनपदों से आने वाले आरोपी फैलाते हैं अपना कारोबार
राजधानी पुलिस को नहीं मिल पा रही ऐसे अपराधियों की जानकारी
जिले में आने वाले व्यक्तियों का पुलिस वेरीफिकेशन करने में बरती जा रही लापरवाही

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी अब अपराधियों की पनाहगाह बन रही है। राजधानी लखनऊ में ऐसे कई बड़े-बड़े कांड हो गए और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लग पाई। दूसरे राज्यों से अपराधी लखनऊ आते हैं, अपने कार्यों को अंजाम देकर निकल जाते हैं और पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है। इस तरह के ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं लेकिन राजधानी पुलिस दांतों तले उंगली दबाने के अलावा कुछ नहीं कर सकी। अपराधी भी पुलिस की नाक के नीचे रहकर अपना कारोबार फैलाते है। बल्कि यूं कहा जाए कि वह पुलिस से अपनी असलियत छिपाकर सांठगांठ बना लेते हैं तो गलत नहीं होगा।
राजधानी अब बड़े-बड़े अपराधियों की शरणस्थली बनती जा रही है। लखनऊ उन्हें सुरक्षित महसूस हो रहा है। इसीलिए अपराधी यहां आसानी से अपना व्यवसाय तक खड़ा कर ले रहे है। पीएस इंटरनेलशल होटल के मालिक पवन गर्ग को ही ले लीजिए। पिछले दस साल से लखनऊ में है। 15 अक्टूबर को पंजाब पुलिस ने पवन गर्ग को गिरफ्तार किया। यह बात पता होते ही स्थानीय पुलिस भी हैरत में पड़ गई। हैरत की बात तो यह है कि पंजाब पुलिस कई बार राजधानी आई और पीएस इंटरनेशनल में ठहरने के बाद खाली हाथ वापस लौैट गर्ई। वहीं, सूत्रों की मानें तो पवन गर्ग के नाका पुलिस से अच्छेे सम्बन्ध थे। वह स्थानीय पुलिस के खर्च उठाता था। पुलिस के कहने पर वह उनके मेहमानों को अक्सर मुफ्त में सेवा देता था। पुलिस की मानें तो पंजाब पुलिस कई बार राजधानी आई। लेकिन नाका पुलिस को बगैर इत्तिला दिये ही पवन गर्ग की तलाश करती रही। कई बार खाली हाथ लौैटने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब पुलिस के पेंच कसे। इस पर पुलिस ने नाका पुलिस से सम्पर्क किया। उसके बाद पवन गर्ग की तलाश की गर्ई। मुखबिर की खबर पर उसे गिरफ्तार किया जा सका।
पवन को उम्र कैद की सजा हुई थी लेकिन वह पे-रोल पर था। उसके बाद से वह करीब डेढ़ साल से कोर्ट में हाजिर नहीं हुआ। वहां से फरार होकर वह लखनऊ आया। यहां महज कुछ सालों के भीतर उसने अपना व्यवसाय खड़ा कर लिया था। यही नहीं, उसने शहर में कई नामचीन होटल भी खड़े कर लिए और पुलिस मूकदर्शक बनी देखती रही। बताया जा रहा है कि पवन गर्ग ने सुपारी लेकर मुक्तेश्वर जिले में किसी की हत्या की थी। राजधानी में ऐसे अनेक अपराधी रहे है जिन पर राजधानी पुलिस ने हाथ डालने की जरूरत नहीं समझी। पवन गर्ग की भी असलियत सामने नहीं आती यदि इसमें पंजाब पुलिस न शामिल हुई होती। नाका कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर राम प्रदीप के मुताबिक पंजाब पुलिस ने उनसे सम्पर्क करके बताया कि पंजाब पुलिस कई बार आरोपी पवन गर्ग को गिरफ्तार करने के लिए राजधानी आई लेकिन उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी। लिहाजा वह वापस लौट गई। इस बार पंजाब पुलिस जब नाका पुलिस से मिली तो पुलिस ने मुखबिर तंत्र के जरिये पवन गर्ग के बारे में पड़ताल की। उसके बाद नाका पुलिस की मदद से उसे गिरफ्तार किया जा सका।
ऐसा ही कुछ मामला अपराधी अजय सिंह का था। वह राजधानी में शानदार जिदंगी गुजार रहा था और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। दो-दो मकान किराए पर लिए था। अजय की लक्जरी लाइफ तो देखते ही बन रही थी। बिहार के गया के रहने वाले डाक्टर पंकज गुप्ता और उनकी पत्नी शुभा गुप्ता के अपहरण के मामले में छह मई को यूपी एसटीएफ, बिहार और लखनऊ पुलिस की संयुक्त टीम ने गोमतीनगर के शारदा अपार्टमेंट के एक फ्लैट से 9 अपहरणकर्ताओं को पकड़ा था। डाक्टर दम्पति 1 मई को गीरडीह में एक शादी समारोह से अपनी कार से लौट रहे थे। रास्ते में बाराचट्टी के पास फाच्र्यूनर कार सवार वर्दीधारी लोगों ने उनको रोक लिया। इसके बाद उन लोगों ने डाक्टर दम्पति को उनकी कार सहित अगवा कर लिया। डाक्टर दम्पति के अपहरण के मामले में छानबीन कर रही बिहार पुलिस को इस बात की
जानकारी मिली कि अपहरणकर्ता और अपहृत दम्पति को यूपी ले जाया गया है। इस जानकारी को बिहार पुलिस ने यूपी डीजीपी से साझा किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए डीजीपी ने यूपी एसटीएफ की टीम इस मामले की छानबीन में लगा दी। एसटीएफ ने जब छानबीन शुरू की तो पता चला कि 22 जनवरी को रोहतास के कारोबारी रवि रज्जन और उनके दो कर्मचारियों के अपहरण इनोवा सवार वर्दी वालों ने किया था। इसके बाद अपहरणकर्ताओं ने घटना के 38 दिन के बाद फिरौती लेकर उनको रिहा कर दिया। कारोबारी की फाच्र्यूनर कार अपहरणकर्ताओं ने अपने पास ही रख ली थी। अपहरणकर्ता गोमतीनगर के मकदूमपुर के शारदा अपार्टमेंट के एक फ्लैट में छुपे हैं। इस पर एसटीएफ लखनऊ और पुलिस की संयुक्त टीम शारदा अपार्टमेंट पहुंची। एसटीएफ टीम ने 9वीं मंजिल पर बने फ्लैट से अपहृत दंपति और अपहरणकर्ता को दबोच लिया।
टीम ने बिहार निवासी अजय सिंह, मृत्युन्जय कुमार, बीटू कुमार, बिजय कुमार, अमित सिंह, सुनील, अमित कुमार, श्रवण कुमार और अनिल सिंह को दबोच लिया। पुलिस ने फ्लैट से तीन पिस्टलें चार लाल-नीली बत्ती, 16 फर्जी नम्बर प्लेट, झारखण्ड पुलिस की वर्दी, कमाण्डो वर्दी और मोबाइल फ ोन बरामद किया। अजय काफी दिनों से फ्लैट में रह रहा था। ऐसा ही मामला जानकीपुरम का था। जानकीपुरम स्थित सहारा स्टेट में रह रहे आरोपी को महाराष्टï्र के रत्नागिरी कुवारबाव आर्शीवाद नगर उत्कर्ष नगर निवासी मोईन काजी उर्फ हेमन्त शाह उर्फ रौनी ब्रिगेन्जा को 13 सितम्बर को एसटीएफ की मदद से दबोचा गया था। मोईन काजी ने 29 अगस्त, 2015 को रत्नागिरी में रहने वाले कारोबारी अभिजीत शिवाजी पाटनकर की पांच गोलियां मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद वह फरार हो गया। उसने लखनऊ को अपना पनाहगाह बना लिया। उसने लखनऊ में रहकर मकान किराए पर लिया और अपना कारोबार फैलाना शुरू कर दिया।
इस मामले में रत्नागिरी के पुलिस अधीक्षक डॉॅक्टर संजय शिन्दे ने उत्तर प्रदेश एसटीएफ से सम्पर्क करके एक टीम राजधानी भेजी। एसटीएफ की मदद से 13 सितम्बर, 2015 को उसे जानकीपुरम इलाके से गिरफ्तार कर लिया। तलाशी के दौरान मोईन काजी के पास से 21 मोबाइल के सिम मिले जो कि राजधानी के पते पर थे। इसके अलावा वह एक कम्पनी खोलने की फिराक में लगा हुआ था। ऐसे मामले तो महज एक
बानगी भर हैं। ऐसे अनेक मामले सामने आए है जिसमें अपराधी, सालों से राजधानी में रह रहे थे और स्थानीय पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। दरअसल राजधानी में किराए का मकान आसानी से मिल जाता है। यहां सत्यापन की कोई बहुत झंझट नहीं है। अधिकांशसत्यापन के मामलों में पुलिस खानापूर्ति करती है। यदि किराएदारों का सत्यापन ठीक से होने लगे तो ऐसे मामलों में निश्चित ही कमी आएगी।

राजधानी की जनसंख्या करीब 3० लाख से ऊपर है। यह सम्भव नहीं है कि अन्य राज्य और जनपद से आए लोगों का पुलिस ब्यौरा रख सके। पुलिस उनका सत्यापन का काम करती है। वह जहां का मूलनिवासी है, वहां की पुलिस से सम्पर्क किया जाता है। ऐसे मामलों में अगर पुलिस को सूचना मिलती है तो फौरन कार्यवाही की जाती है।
-राजेश पाण्डेय, एसएसपी

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