अपनों ने मुंह मोड़ा विदेशियों ने अपनाया

  • एलयू में भारतीय भाषाओं को सीखने आ रहे हैं विदेशी
  • भारतीय छात्र नहीं ले रहे इन विषयों में रुचि

हिना खान
Captureलखनऊ। अदब और तहजीब के नाम से जानी जाने वाली राजधानी जो अपनी अलग-अलग भाषाओं के लिए लोगों के दिलों में बसती है। वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय इन भाषाओं को सिखाने के लिए विदेशों में लोकप्रिय है। आज वहीं की हालात यह हैं कि इस वर्ष इन भारतीय भाषाओं के क्लास सूने पड़े हैं। हिन्दी, उर्दू ,संस्कृत, फारसी, अरबी इन सभी भाषाओं में प्रवेश नाम मात्र ही हुए हैं। वहीं विदेशों से भारतीय भाषाओं को सीखने के लिए विवि में प्रवेश ले रहे हैं।
विश्वविद्यालय में हर वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष हिन्दी, उर्दू, संस्कृत,अरबी,फारसी, जैसे विषयों में अधिकतर सीटें खाली रह गई हैं। उर्दू विभाग में स्नातक में कुल 35 सीटें हैं लेकिन केवल नौ छात्रों ने ही एडमिशन लिया है। अंग्रेजी में प्रवेश प्रक्रिया पूरी कराने वाले कुछ छात्रों ने अपना प्रवेश कैंसिल करवा लिया है। वहीं दूसरी तरफ विदेशी छात्र लखनऊ विश्वविद्यालय में हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, अरबी, फारसी विषयों में प्रवेश ले चुके हैं। वहीं कुछ विदेशी छात्र रिसर्च के लिए आवेदन कर रहे हैं।
इस वर्ष के आकड़े देख विवि प्रशासन व विभागाध्यक्षों में काफी चिंता व्याप्त है। सभी को यह चिंता सता रही है कि अपनी भाषा के लिए अलग पहचान रखने वाला लखनऊ विश्वविद्यालय अपनी पहचान न खो दे। अजय सिंह का कहना है कि लखनऊ में मुस्लिम से लेकर गैर मुस्लिम सभी इन भाषाओं का बखूबी इस्तेमाल करते हैं,जिससे इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि वह किस धर्म से तालुक रखता है। राजधानी की इस खूबी का श्रेय कहीं न कहीं लखनऊ विश्वविद्यालय को ही जाता है।

पिछले सालों की अपेक्षा घटे प्रवेश

विषय सीटें इस वर्ष प्रवेश पिछले वर्ष प्रवेश
अरबी 66 2 20
उर्दू 35 9 17
पर्शियन 66 9 15
संस्कृत 50 6 15

विदेशियों को भा रही भारतीय भाषा
जहां एक ओर भारतीय स्टूडेंटस इन भाषाओं से दूरी बना रहे हैं वहीं विदेशीय भाषाओं को अपना रहे हैं। इन सभी विषयों में प्रवेश के लिए विदेशी छात्र आवेदन कर रहे हैं। हर वर्ष विश्वविद्यालय के उर्दू ,पर्शियन, संस्कृत, हिन्दी विभागों से विदेशीय छात्र शिक्षा ग्रहण करते हैं। इस साल भी हिन्दी विभाग में दो पर्शीयन विभाग में चार व उर्दू विषय में विदेशी छात्रों द्वारा आवेदन किए गए हैं।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

शहर के 90 फीसदी से अधिक स्कूलों में उर्दू, अरबी नहीं पढ़ाई जाती। ऐसे में हमारे यहां जो स्टूडेंट आते हैं वह ज्यादातर मदरसों के होते हैं। बीए में जो एंट्रेंस हुआ उसमें उनसे सोशल साइंस, इकॉनमिक्स आदि विषयों से सवाल पूछे गए। जो उन्होंने कभी पढ़ा ही नहीं। ऐसे में वह रैंक में काफी पीछे रह गए। अगर उर्दू जबान को बढ़ावा देना है, तो शुरुआत की कक्षाओं में सभी स्कूलों में इसे अनिवार्य कर देना चाहिए। केवल उर्दू ही क्यों अपने देश की पहचान बनी उन सभी भारतीय भाषाओं को संरक्षित करने की अवश्यकता।
-ए.आर. नैयर, उर्दू विभागाध्यक्ष

फारसी अरबी में हमारे यहां लोगों इसमें भले ही कोई रोजगार न दिखता हो लेकिन विदेशों में इन भाषाओं की बहुत मांग हैं। विदेशों में इन विषयों को जानने वाले अच्छे रोजगार हैं। देखा जाए तो हमारे यहां की बदनसीबी है कि हमारे यहां सब कुछ होकर भी लोग इसके विषय में नहीं जानते हैं। ऐसी भाषाओं के विषय स्पेशलाइज करने वाले भी कम हैं। जिसकी वजह से बहुत सी मेनुस्क्रिप्ट के विषय में कोई नहीं जान पाता। यही वजह कि हम अपने देश की बेहतरीन मेनुस्क्रिप्ट को सहेज नहीं पा रहे हैं। इसका फायदा विदेशी उठा रहे हैं।
-डॉ. आरिफ अय्यूबी, पर्शियन विभागाध्यक्ष

Pin It