अनुशासन के नाम पर बंद करो प्रताडऩा

यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 65 प्रतिशत बच्चे स्कूल में अनुशासन के नाम पर शारीरिक और मानसिक हिंसा के होते हैं शिकार
स्कूल गाइडलाइन के अनुसार छात्रों को नहीं दे सकते दंड

प्रीति सिंहCapture
लखनऊ। शिल्पी सुबह जब अपनी पांच साल की बेटी रिया को स्कूल के लिए तैयार करने लगी तो उसने स्कूल जाने से मना कर दिया। पिछले चार दिन से रिया स्कूल जाने में आनाकानी कर रही थी। शिल्पी को कुछ खटका कि आखिर वह ऐसा क्यों कर रही है? वह तो खुशी-खुशी स्कूल जाने के लिए तैयार होती थी। उसने बहला-फु सलाकर रिया से कारण पूछा तो उसने बताया-जब मैं लिख नहीं पाती हूं या टिफि न फि निश नहीं करती हूं तो मैम डांटती हैं और कहती हैं बाथरूम में बंद कर दूंगी। रूद्रांश को तो बाथरूम में ले के गयी थी। शिल्पी ने जब स्कूल में टीचर से बात की तो उसने कहा बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए कभी-कभार उन्हें डराया जाता है।
ऐसा सिर्फ रिया के साथ ही नहीं है। अधिकांश स्कूलों में अनुशासन के नाम पर बच्चों को शारीरिक और मानसिक सजा दी जाती है। जिसका परिणाम है कि बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते। पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता। जबकि 2008-09 में आयी सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन में स्पष्ट उल्लेख है कि छात्रों के साथ शारीरिक या मानसिक हिंसा नहीं होनी चाहिए। नर्सरी में पढऩे वाले यशनिल की सुनिए। मैम ने किसी बात के लिए मना किया। वह नहीं माना तो उसकी पिटाई हो गयी। स्कूल लेने गये पापा को देखा तो रोने लगा। बताया मैम ने मारा। प्रिसिंपल से शिकायत हुई तो मैम ने साफ मना कर दिया कि उन्होंने नहीं मारा। बच्चा झूठ बोल रहा है। खैर समझाबुझा कर बात वहीं खत्म हो गयी। ये तो छोटे बच्चों की बात है जो ठीक से अपनी बात कह नहीं पाते। बड़े बच्चे भी अनुशासन के नाम पर पिस रहे हैं। अधिकांश स्कूलों में कोर्ट की गाइडलाइन का पालन नहीं हो रहा है। अमेठी के एक स्कूल में प्रबंधक ने छात्र की बुरी तरह पिटाई की। कोर्ट कहता है कि स्कूलों में बच्चों को गरिमा के साथ अनुशासन का पाठ पढ़ायें। बच्चों को बुरी तरह से डांटना, पिटाई करना या मानसिक रूप से उन्हें परेशान करना सख्त मना है। ऐसे मामले में पुलिस केस का भी प्रावधान है। यूनीसेफ की भी रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती हैै। रिपोर्ट के अनुसार 65 प्रतिशत बच्चे स्कूल में अनुशासन के नाम पर शारीरिक और मानसिक हिंसा के शिकार होते हैं। पर अधिकांश मामलों में अभिभावक को समझौता करना पड़ता है। मामला बहुत बिगड़ता है तभी पुलिस का हस्तक्षेप होता है।

बच्चों के साथ हिंसा करने पर सस्पेंड करने का है प्रावधान

इस संबंध में रिटायर्ड स्कूल प्रिसिंपल डॉ. मंजू जैन कहती हैं-अब तो आये दिन आपको देखने और पढऩे को मिलेगा कि फ ला स्कूल में टीचर ने बच्चे को मार दिया। कान से खून आ गया या सिर में चोट लग गयी। स्कूलों में फि जिकल, मेंटल पनिशमेंट पर पूरी तरह से कंट्रोल कर पाना बहुत मुश्किल है। सरकारी स्कूल हो या कान्वेंट सभी जगह बच्चे हिंसा के शिकार हैं। दूर-दराज गांवों में जो स्कूल हैं वहां न तो अभिभावक शिकायत करते हैं न ही मीडिया की पहुंच है। जबकि बच्चों के साथ टीचर द्वारा किसी तरह की हिंसा करने पर तुरंत सस्पेंड कर दिया जाता है यह कोर्ट की गाइडलाइन है। टीचर को ट्रेनिंग के दौरान सारी चीचें बतायी जाती हैं। डॉ. मंजू जैन कहती हैं- 2005 में लखनऊ के एक बड़े पब्लिक स्कूल की घटना जिसमें 10 साल की बच्ची टीचर की पनिशमेंट की वजह से अपनी जिदंगी से हाथ धो बैठी। कॉलेज प्रशासन ने तो मामले को दबा ही दिया था पर बच्ची के माता-पिता ने हार नहीं मानी। उनकी कोशिशों की वजह से ही वह दरिंदा टीचर सलाखों के पीछे गया\

यर्थाथ से भागने लगते हैं बच्चे

मनोचिकित्सक प्रो. एस.के. तिवारी बच्चों के साथ किसी तरह की हिंसा को अच्छा नहीं मानते है। वह कहते है-घर, स्कूल कही भी बच्चों को सिर्फ 5 मिनट के लिए सजा देने को कहा जाता है। जिसे टाइमआउट पनिशमेंट कहते है। पांच मिनट के लिए आप छात्र को को क्लास में एक कोने में खड़ा कर सकते है। यदि बच्चा फिर वही गलती करता है तो दुबारा आप उसे 5 मिनट के लिए एकांत में खडा करें। इसके अलावा आप और कोई सजा बच्चे को नहीं दे सकते। प्रो. तिवारी कहते है बच्चों के शुरूवाती दिनों में एक-दो चीजे बहुत प्रमुख होती है। उसमें एक है उत्सुकता। बच्चे बहुत सारी गलतियां उत्सुकता बस करते हैं। जब हम बच्चे के कॉरपोरल पनिशमेंट देते है तो उन्हें मानसिक आघात लगता है। किसी भी दशा में बच्चे को शारीरिक दंड अच्छा नहीं है। इससे उनका मानसिक स्वास्थ बिगड़ता है और फिर वह उन चीजों भागने लगते है। पहल करने की क्षमता कम होने लगती है। अपनी क्षमता पर संदेह करने लगते है। अनिच्छुक होने लगते है, या यह कह सकते है कि बच्चे पलायनवादी होने लगते है। इसीलिए बच्चे को शारीरिक दंड से बचाया जाता है।

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