अनाम रहकर राष्ट्र सेवा में जुटा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

 राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना आज से नब्बे वर्ष पूर्व विजयादशमी के दिन हुई थी। संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने संघ की प्रार्थना के अनुरूप भारत को परम वैभव के शिखर पर पहुंचाने के लिए स्वयं सेवकों और समाज को प्रेरित करने का प्रयास किया है। अनेक विकृत विभ्रम फैलाए जाने के बावजूद संघ का कार्य बढ़ता ही गया है। संघ स्वयं में न केवल विश्व का सबसे बड़ा और सुगठित प्रगतिशील सामाजिक संगठन है बल्कि उसके स्वयंसेवकों ने सेवा और राजनीति के क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रभाव बनाया है। संघ का एक स्वयंसेवक न केवल देश का प्रधानमंत्री है और परमवैभव की कल्पना को साकार करने की अपेक्षा का प्रतीक बन गया है अपितु वसुधैव कुटुम्बकम् की भारतीय ऋषियों की आकांक्षा के अनुरूप विश्व को ले जाने के लिए आशा का केंद्र बना हुआ है।
भारतीय जीवनशैली जो सर्वे भवन्तु सुखिना की अवधारणा पर आधारित है, जिसका अध्यात्म चर अचर सभी से सामंजस्य की सीख देता है, विश्व के लिए अस्तित्व बचाये रखने का एकमात्र मार्ग दिखाई दे रहा है। भारतीय पुरूषार्थ विश्व का सही रास्ता दिखाये-दिखाता रहे-उस दिशा में हमारी प्राथमिकता की साख बन रही है। संभव है यह कुछ लोगों के लिए सिरदर्द हो लेकिन विश्व भर में बसे भारतीय मूल के लोगों में अपनी संस्कृति और सभ्यता के लिए गौरवान्वित होना चाहिए, इसके लिए संघ के विश्व विभाग ने संसार के सौ से भी अधिक देशों में जो प्रयास किए हैं, उसकी झलक भारत के प्रधानमंत्री की यात्राओं के दौरान तो दिखाई ही पड़ी है, योग को प्राय: विश्व के सभी देशों ने समर्थन और सहयोग प्रदान कर जिस अनुकूलता का परिचय दिया है उससे यही स्पष्ट होता है कि डॉक्टर हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण के जिस कार्य को एक छोटे से मैदान में कुछ किशोर युवकों को खेल खेल में आभास कराया था, उसे व्यापक रूप में बदल कर अनाम रहकर वर्षानुवर्ष जिन स्वयंसेवकों ने तपस्या की है और अभी कर रहे हैं, उनके निष्काम कर्म का प्रतिफल मिलने लगा है। संघ ने लगभग दो दशक पूर्व कहा था 21वीं शताब्दी हिन्दू शताब्दी होगी। हिन्दू अर्थात सर्वेभवन्ति सुखिना और वसुधैव कुटुम्बकम् के प्राचीन ऋषियों के आदर्श को जीवन में अपनाने वाले डॉक्टर हेडगेवार के बारे में कहा गया कि ये अकेले आये लेकिन स्वयं को बीज के समान बोकर संघ को उगाया है।
मानवता की भावना को जागृत करने के लिए अनाम रहकर सेवारत इस संगठन को अकसर कठिनाइयों का, भ्रामक प्रचार अफवाहों, मान्यता प्राप्त लोगों की विपरीत अभिव्यक्ति का सामना करना पड़ा है। एक अर्से तक सोवियत यूनियन के हस्तक बनकर काम करने वाले साम्यवादियों ने तो (जो कभी विदेश नहीं गए) मुसोलनी और हिटलर का अनुगामी बता दिया, साथ ही कहा कि संघ की स्थापना उनके परामर्श से ही हुई है। अंग्रेजों ने 1934 में संघ पर पहला प्रतिबंध लगाया था उसके बाद महात्मा गांधी हत्या, आपातकाल की निरंकुशता और अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराये जाने के बाद भी इस संगठन को प्रतिबंधित कर रोकने का प्रयास किया गया। अंग्रेजों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध का विरोध सभी राजनीतिक दलों ने किया, गांधी की हत्या के बाद का प्रतिबंध संघ स्वयंसेवकों के सत्याग्रह से हटा और आपातस्थिति का प्रतिबंध हटवाने के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने उस समय की इंदिरा गांधी सरकार को उखाड़ फेंकने में मुख्य भूमिका निभाई तथा बाबरी ढांचा गिरने के बाद के प्रतिबंध को न्यायालय ने अवैध करार दिया।
अपनी शक्ति का संज्ञान और न्यायालय की निष्पक्षता के परिणाम के बावजूद भी संघ को भ्रामक प्रचार से घेरने का प्रयास जारी रहा-जारी है। सेवा के सभी क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवक सक्रिय हैं। इस सक्रियता ने उन लोगों को संघानुकूल बनाने का काम किया है जो उसके सर्वथा विपरीत थे, जैसे जयप्रकाश नारायण जो संघ को सदैव के लिए प्रतिबन्धित किए जाने के पक्षधर थे। जो भी विभाजक, विघटनकारी, विदेशी हस्तक और सत्ता के लोभी हैं सब मिलकर संघ के खिलाफ सदैव लामबंद रहे हैं। उनके प्रयासों के बावजूद संघ के अनुकूलता बढ़ते जाने का कारण संभवत: उसका मूल्यों और आदर्शों पर अग्रिम रहना है। डॉक्टर हेडगेवार ने कहा था संघ हिन्दुओं का संगठन है। इस पर संघ को मुस्लिम और ईसाई विरोधी संगठन के रूप में प्रचारित करने का प्रयास चला आ रहा है। यह भी प्रश्न किया गया कि यदि संघ वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास रखता है तो वह सिर्फ हिन्दुओं का संगठन ही क्यों है। संघ के संस्थापक और सभी सरसंघचालकों ने सरलता से समझने वाला इसका बार-बार उत्तर दिया है। जब तक हमें स्वयं को अपने गौरवमय अतीत और ऋषियों द्वारा प्रदत्त जीवन शैली पर विश्वास नहीं होगा हम औरों का भरोसा कैसे जीत सकेंगे?

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