अधिकारियों के भ्रष्टाचार की दास्तां बयां कर रहा गोमतीनगर का आरआर प्लांट

  • 30 साल पहले बना कूड़े से खाद बनाने का प्लांट बदहाल, जंग खा रहीं प्लांट में लगी मशीनें

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। एक ओर जहां शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए नगर निगम से लेकर शासन-प्रशासन तक रोजाना बैठकें की जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर जनता की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग किया जा रहा है। गोमतीनगर स्थित आरआर विभाग के सामने लगभग 25 से 30 वर्ष पहले कूड़े से खाद बनाने के लिए नगर निगम की ओर से प्लांट बनवाया गया था और इसके निर्माण के लिए अधिकारियों ने तेजी से कवायद की थी। वहीं कुछ दिन प्लांट चलने के बाद से अब तक खड़े-खड़े धूल फांक रहा है। वहीं इस प्लांट को जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनवाया गया था। वह दर किनार हो गया। इससे साफ है कि यह प्लांट भी अधिकारियों की कमीशनखोरी की भेंट चढ़ गया। यदि इसी तरह भ्रष्टï अफसर जनता के पैसे को लूटते रहेंगे तो शहर को स्मार्ट बनाने का सपना पूरा कर पाना मुश्किल हो जाएगा।
खंडहर में तब्दील हुआ प्लांट
नगर निगम के अधिकारी तीस वर्ष पहले कूड़े से खाद बनाने वाले प्लांट की जानकारी हासिल करने विदेश गये थे। वहां से प्लांट से जुड़ी सारी जानकारी लेकर निगम के अधिकारियों की टीम वापस लौटी। कूड़े से खाद बनाने का प्लांट लगाने के लिए करोड़ों रुपये का बजट पास हुआ। टेंडर के माध्मय से ठेकेदारों को इसके निर्माण की जिम्मेदारी दी गई। करीब तीस वर्ष पहले इस प्लांट के निर्माण की नींव गोमतीनगर के आरआर विभाग के सामने रखी गई थी। उस दिन से लेकर आज तक प्लांट की तरफ किसी ने भूलकर भी नहीं देखा। यह प्लांट कूड़े और मलबे के ढेर के बीच अपनी बदहाली की दासतां खुद बयां कर रहा है। प्लांट धीरे-धीरे खण्डहर में तब्दील हो गया है। वहीं इस प्लांट की मशीनों को खुले आसमान के नीचे रखने की वजह से जंग लग गई है। मशीनें कबाड़ में तब्दील हो गई हैं। वहीं कुछ लोगों ने प्लांट की कई मशीनें बेचे जाने की आशंका भी जताई हैं। इसके अलावा प्लांट की अन्य चीजों पर धूल, जंग और कूड़े कचरे के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। मतलब साफ है कि सिर्फ अधिकारियों ने अपने कमीशन के चलते प्लांट बनाने की कवायद तो जोर-शोर से शुरू की लेकिन कमीशन मिलने के बाद यह प्लांट बंद हो गया और अधिकारियों के भ्रष्टाचार का शिकार हो गया।
कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा कूड़े से खाद बनाने का प्लांट
जानकारों की मानें तो नगर निगम अफसर नये प्रोजेक्ट की जानकारी लेने के लिए अक्सर सरकारी पैसे से विदेश जाते हैं और जानकारी लेने के बजाय घूमने-फिरने का आनंद लेते हैं। वहां से लौटने के बाद नये प्रोजेक्ट पर आनन-फानन में काम तो शुरू होता है लेकिन सरकारी पैसे में कमीशन खाने के बाद जो शेष बजट बचता है, उस पर प्रोजेक्ट परवान चढ़ता है। इसके बाद वह प्रोजेक्ट चले या न चले उस पर कोई अधिकारी ध्यान नहीं देता। कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं, जिन पर करोड़ों रुपये नगर निगम ने खर्च किये हैं और वह कूड़े के ढेर में तब्दील हो चुके हैं।
अधिकारी बदलते ही प्रोजेक्ट पर लग जाता है ब्रेक
नगर निगम के अधिकारी किसी प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले ही अपना कमीशन पक्का कर लेते हैं। उसी का नतीजा है कि प्रोजेक्ट परवान चढऩे से पहले ही दम तोड़ देते हैं। वहीं मौजूदा अधिकारी प्रोजेक्ट से कमीशन मिलने के बाद दूसरे कामों में उलझ जाते हैं। यदि उनका ट्रांसफर हो गया, तो दूसरा अधिकारी उस प्रोजेक्ट की ओर ध्यान नहीं देता है और वह भी कमीशन के चलते अन्य नये प्रोजेक्टों पर काम करने लगते हैं। इसी तरह नगर निगम के नये-नये अफसर आकर जनता के पैसों से अपनी जेबें भरने में जुट जाते हैं।
30 साल बाद भी शुरू नहीं हो सका प्लांट

जानकारों की माने तो कूड़े से खाद बनाने के लिए नगर निगम की ओर से लगाया गया प्लांट करीब 30 सालों से ऐसे ही धूल फांक रहा है। जो कि विभाग में बुरी तरह फैले भ्रष्टाचार को उजागर कर रहा है। प्लांट के चालू ना होने से यह साफ हो गया है कि अधिकारी अपना कमीशन साधने के बाद दूसरे प्रोजेक्टों को शुरू करने के काम में लग गए हैं, जिससे कमाई का नया जरिया बन सके।

क्या कहते है अधिकारी 

इस संबंध में जब नगर निगम, आरआर विभाग, प्रभारी दीपक यादव को कई बार फोन किया गया लेकिन उन्होंने फोन उठाना जरूरी नहीं समझा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि नगर निगम में अधिकारियों की तानाशाही किस कदर प्रïभावी है। 

नगर निगम में कमीशनखोरी के चलते हर साल नये-नये प्रोजेक्ट लांच किये जाते हैं। अधिकारी अपना मतलब निकालने के बाद प्रोजेक्ट के बारे में भूल जाते हैं। प्रोजेक्ट से जुड़े लोग अपनी जेबें भरने में कामयाब हो जाते हैं लेकिन प्रोजेक्ट की फाइलें और काम पर ब्रेक लग जाता है। इसी तरह कई साल से नये-नये प्रोजेक्ट बनाकर नगर निगम के राजस्व को लूटा जा रहा है। जो भी अधिकारी आता है, वह लूटने की फिराक में लग जाता है। ट्रांसफर होने के बाद सभी उस प्रोजेक्ट को भूल जाते हैं।
दुर्गेश वाल्मीकि
पदाधिकारी, स्थानीय निकाय एवं सफाई कर्मचारी संयुक्त मोर्चा

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