अतिक्रमण से जूझता शहर व सरकारी तंत्र

अतिक्रमण से जूझता शहर व सरकारी तंत्र

sanjay sharma

सवाल यह है कि अतिक्रमण हटाने में सरकारी तंत्र विफल क्यों है? अतिक्रमण हटाने के बाद दोबारा उसी स्थान पर अतिक्रमण कैसे लग जाता है? इन अतिक्रमणकारियों को कौन शह दे रहा है? क्या पुलिस और निगमकर्मियों की मिलीभगत से यह खेल चल रहा है? क्या शहर को जाम से निजात दिलाने के लिए ऐसे लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होगी? .

तमाम दावों के बावजूद यूपी के अधिकांश शहर अतिक्रमण से जूझ रहे हैं। लखनऊ की भी हालत कोई अलग नहीं है। यहां सडक़ से लेकर बाजारों तक में अतिक्रमणकारियों का कब्जा है। इसके कारण लोगों की आवाजाही बाधित होती है। वहीं जाम लगने के कारण वातावरण में प्रदूषण भी फैलता है। सवाल यह है कि अतिक्रमण हटाने में सरकारी तंत्र विफल क्यों है? अतिक्रमण हटाने के बाद दोबारा उसी स्थान पर अतिक्रमण कैसे लग जाता है? इन अतिक्रमणकारियों को कौन शह दे रहा है? क्या पुलिस और निगमकर्मियों की मिलीभगत से यह खेल चल रहा है? क्या शहर को जाम से निजात दिलाने के लिए ऐसे लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होगी? अतिक्रमण हटाओ अभियान का असर क्यों नहीं दिख रहा है? क्या सरकारी तंत्र शहर में बढ़ते अतिक्रमण को लेकर लापरवाही बरत रहा है? क्या ऐसे ही स्मार्ट सिटी का सपना साकार होगा?
प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अतिक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है। बाजार से लेकर सडक़ तक इन अतिक्रमणकारियों के कब्जे में हैं। दुकानदार सडक़ों के ऊपर सामान सजा देते हैं। रही-सही कसर ठेले वाले निकाल देते हैं। वे सडक़ पर ठेला लगाकर सामान बेचते हैं। चारबाग से लेकर पत्रकारपुरम तक सडक़ों पर अतिक्रमण आम है। अमीनाबाद में इस कदर अतिक्रमण है कि यहां की सडक़ गली में तब्दील हो चुकी है। इसके कारण सडक़ों पर जाम की स्थिति बनी रहती है। जाम के कारण लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। कई बार जाम में एंबुलेंस के फंस जाने से गंभीर मरीजों की जान पर आ पड़ती है। इसके कारण जाम के दौरान वाहनों से निकलने वाला धुआं और धूल वातावरण में प्रदूषण फैलाता है। इसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है। बढ़ते प्रदूषण के कारण राजधानी में सांस और हृदयरोगियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। शहर को अतिक्रमण मुक्त रखने की जिम्मेदारी नगर निगम को सौंपी गई है। इसके लिए नगर निगम के पास पर्याप्त संसाधन भी हैं। नगर निगम कई बार अतिक्रमण हटाता भी है लेकिन टीम के वापस लौटते ही फिर उसी स्थान पर अतिक्रमणकारी जम जाते हैं। यह सारा खेल पुलिस और नगर निगम कर्मियों की शह पर चल रहा है। लिहाजा अतिक्रमण हटाओ अभियान बेअसर साबित हो रहा है। यही नहीं पुलों के नीचे और ओवर फुट ब्रिज तक पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा है। जाहिर है यदि सरकार राजधानी को अतिक्रमण मुक्त करना चाहती है तो उसे न केवल संबंधित विभागों को जवाबदेह बनाना होगा बल्कि अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी अन्यथा लखनऊ को स्मार्ट बनाना सपना साबित होगा।

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