अच्छाइयों में कुछ और सकारात्मक जोडऩे का अवसर

मिथिलेश कुमार सिंह

पवित्र महीने रमजान का वर्तमान में राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल बंद हो गया है। यूपीए सरकार के दौरान रोज इफ्तारी के नाम पर दावत और उससे बढक़र राजनीति चमकाने वालों को निराशा तो हुई ही होगी, इस बात में शक नहीं। धर्म के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों के बेशक एक भी मुसलमान दोस्त न हों, लेकिन इस समुदाय का हितैषी होने का दिखावा करना छुटभैये नेताओं से लेकर राष्ट्रीय नेताओं तक ने बेहतर ढंग से सीख लिया था। सवाल उठता है कि क्या आज हमारे मुसलमान भाई रमजान नहीं मना रहे हैं कि रोजा नहीं रख रहे हैं या फिर उनकी आस्था में कोई कमी आयी है? जी नहीं, मुसलमान भाई तो हमेशा की तरह अपनी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं और उनके उत्साह में कोई कमी भी नहीं है। हाँ, अखबारों और टेलीविजनों में ‘ड्रामा’ जरूर पीछे छूट गया है और सच पूछा जाए तो धर्म का वास्तविक स्वरूप यही है कि उसे शोशेबाजी में लिप्त न किया जाए और उसे आपस में वैमनस्य का कारण भी न बनाया जाए।
आखिर हमारे देश में त्यौहार और उत्सव कोई आज से तो मनाए नहीं जा रहे हैं, लेकिन यह मानने में हमें कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि यूपीए सरकार ने अपने दो कार्यकाल के दौरान इस मोर्चे पर भी राजनीति करने की गैर जरूरी कोशिश की थी। बेवजह तुष्टिकरण करना, किसी समुदाय को सिर्फ वोट-बैंक मानकर उसके साथ व्यवहार करना किसी सरकार को कतई शोभा नहीं देता है। कई आलोचक यह भी कह सकते हैं कि ‘यूपीए’ सरकार और उसके नेता धर्मभीरू थे, तो उसका जवाब यह है कि अन्य धर्मों के प्रति, यहाँ तक कि हिन्दू त्यौहारों पर भी यूपीए की दरियादिली ‘बधाई सन्देश’ से आगे नहीं बढ़ती थी। इसके जवाब में, देश की जनता ने कांग्रेसनीत गठबंधन को 2014 में खारिज किया और इस सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि इस तरह की ‘बेवजह तुष्टिकरण’ नीतियां भी काफी हद तक जिम्मेदार रहीं।
जहाँ तक बात रमजान की है तो इस्लाम धर्म में रमजान के महीने का एक अलग ही महत्व है। इस महीने को पाक यानि पवित्र रमजान महीने के नाम से भी जानते हैं तो हमारे मुसलमान भाई-बहन इस सम्बन्ध में मानते हैं कि रमजान के इस पाक महीने में अल्लाह की रहमत बरसती रहती है। इसी रमजान के महीने में एक खास दिन होता है जमात-उल-विदा। यह जमात-उल-विदा रमजान के सत्ताइसवीं शब (27वीं रात) को मनाई जाती है। यह अवसर इस्लाम धर्म के संस्थापक हजऱत मुहम्मद साहब के जन्म दिवस के रूप में भी माना जाता है। मुसलमानों का ऐसा मानना है कि हजऱत मुहम्मद साहब इसी दिन धरती पर आये थे और इसलिए इस ख़ास रात को इबादत करने वालों की दुआएं पहले क़ुबूल होती हैं। इस दिन नमाज पढऩे के लिए मस्जिदों में बहुत भीड़ इक_ी हो जाती है, जिसके लिए नियत स्थान पर पहले से ही इंतजाम किया जाता है।
चूंकि, रमजान में रोजे से ज्यादा इस महीने में की गयी इबादत का महत्व है और किसी व्यक्ति को दु:ख नहीं पहुंचाना भी बड़ी इबादत मानी गयी है। इस महीने में जमाल-उल-विदा का पर्व उत्साहपूर्ण ढंग से मनाने के बाद ऐसा लगता है कि बस अब रमजान का महीना ख़त्म होने वाला है। इसके पहले ही मस्जिदों और घरों की साफ-सफाई करके इसे दुल्हन की तरह सजाया जाता है। जाहिर है गन्दगी में कोई भी त्यौहार नहीं मनाया जा सकता है, बेशक वह बाहरी गंदगी हो अथवा मन की और रमजान के पवित्र महीने का यह सन्देश हर एक मुसलमान बखूबी समझता है, तभी तो वह इस माह के दौरान गलत शब्द नहीं बोलता है और शराब इत्यादि के सेवन से तो कोसों दूर रहता है।
सच कहूं तो एक हिन्दू होने के बावजूद ‘रमजान’ के पूरे महीने में जिस तरह ‘तीस के तीस’ दिन अच्छी आदतों का अभ्यास कराया जाता है, उसका कायल हूँ। इसे उदाहरण से आप यूं समझ सकते हैं कि आप किसी भी शराबी को अगर 30 दिन शराब से दूर कर दो तो इस बात की सम्भावना होती है कि उसकी यह बुरी आदत छूट जाएगी। हालाँकि, कई लोग बाद में बुरी आदतों को फिर पकड़ लेते हैं और उसका कारण यही है कि रमजान के धार्मिक महत्त्व को तो कई लोग समझते हैं, किन्तु उसके ‘वैज्ञानिक पक्ष’ का जि़क्र लगभग भुला दिया गया है। अगर मुसलमान भाई इसके ‘वैज्ञानिक पक्ष’ पर थोड़ा गौर करें तो कोई कारण नहीं कि वह हर एक मामले में आगे होंगे। सच कहा जाए तो ऐसे ही इस्लाम के कई दूसरे पक्षों पर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है। पुराने जमाने में लगभग हर एक धर्म में कई औरतों से शादियां करना और उनको छोड़ देना एक परंपरा सी रही है, किन्तु बदलते जमाने में वह सभी लगभग बदल चुके हैं। रमजान के पवित्र मौके पर अगर भारतीय मुसलमान वैज्ञानिक दृष्टि से सोचें तो वह उस दर्द को समझ पाएंगे कि एक महिला को ‘तलाक-तलाक-तलाक’ कह देने पर क्या जि़ल्लत और बदनसीबी झेलनी पड़ती है। आज मुसलमान औरत भी पढ़ लिख रही हैं और ऐसे में ‘तलाक’ से उसके आत्मसम्मान का क्या हश्र होता है, इसे आसानी से समझा जा सकता है। तो क्या यह सही वक्त नहीं है कि भारतीय मुसलमान उन लाखों आंदोलनकारी मुस्लिम महिलाओं की मांग पर भी गौर फरमाएं जो अपने लिए बराबरी का ओहदा चाहती हैं। यह जिम्मेदारी भारतीय मुसलमानों पर ही सबसे ज्यादा इसलिए है, क्योंकि पाकिस्तान में ‘महिलाओं की हल्की पिटाई’ का कानून बनाने की बात कही जा रही है। यह सही अवसर है कि जब जमाल-उल-विदा के दिन मस्जिद में लोग इक_े होते हैं तो वह इन तमाम मुद्दों पर ‘वैज्ञानिक ढंग’ से विचार करें। इसमें पढ़े लिखे और प्रोफेशनल मुस्लिम ज्यादा बेहतर रोल अदा कर सकते हैं, क्योंकि पुराने और रूढि़वादी लोगों के लिए बदलाव हमेशा ही नामुमकिन सा रहा है।
इतिहास ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है, जब इस्लाम के फॉलोअर्स ने ईमान की खातिर अपनी जानें ‘कुर्बान’ की हैं, किन्तु आज इसकी छवि पर नकारात्मक असर क्यों है, इस बाबत मुस्लिम समुदाय के युवा और परिवर्तन चाहने वालों को अवश्य ही विचार करना चाहिए।

अल्लाह और ऊपरवाला सर्व शक्तिमान है, इस बात में कोई दो राय नहीं लेकिन उसके नाम और संदेशों की गलत व्याख्या करने वालों को रोकना भी प्रगतिशील मुसलमानों का ही धर्म है। ऐसे लोगों का कड़ाई से विरोध होना चाहिए, जो गलत और पुरानी पड़ चुकी चीजों में बदलाव की बात में जबरदस्ती ‘कुरआन और हदीस’ को ले आते हैं। उन्हें सार्थक बदलावों पर ‘चुप्पी’ नहीं साधनी चाहिए, क्योंकि इससे उनका ही नुक्सान सर्वाधिक होता है। आखिर रमजान के महीने में इन सार्थक बातों पर विचार करने से बेहतर और क्या होगा? रमजान का महीना अंतिम दिन चाँद को देखने के साथ ही खत्म होता है, जिस दिन को ईद के नाम से मुसलमान भाई मनाते हैं।

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