अगर पीआईएल के खेल में नहीं फंसते तो चीफ सेक्रेटरी हो सकते थे अनिल गुप्ता

23 JUNE PAGE 1 REV1

 

  • नोएडा के चेयरमैन बनने के लिए अपने चेलों से कराई थी पीआईएल
  • ठण्ड से बच्चे नहीं मरते जैसा दिया था विवादित बयान
  • नेताजी के आगे आंख में आंसू भरकर बोले अनिल, मेरा सपना है चीफ सेक्रेटरी बनने का
  • आलोक रंजन के खिलाफ पीआईएल में भी थी अनिल की महत्वपूर्ण भूमिका

संजय शर्मा
लखनऊ। अगर आईएएस अनिल कुमार गुप्ता थोड़े लालच के चक्कर में नहीं पड़ते तो वह एक जुलाई को यूपी के मुख्य सचिव होते। प्रमुख सचिव गृह और औद्योगिक विकास जैसे भरी-भरकम महकमे संभालते समय नोएडा के भी सर्वेसर्वा बनने की चाहत में अनिल गुप्ता ने जो कदम उठाया वो उनकी जिंदगी का सबसे घातक कदम साबित हुआ, जिसका नतीजा वो आज तक भुगत रहे है। एक समय सरकार के सबसे करीबी अनिल ने नोएडा का चैयरमेन बनने के लिए अपने कुछ चहेतों से जनहित याचिका दायर करवा दी थी। सीएम अखिलेश यादव को जैसे ही यह बात पता चली, उसके चौबीस घंटे के भीतर अनिल गुप्ता को उनकी हैसियत बता दी गई और उन्हें राजस्व परिषद में भेज दिया गया। अब अपने रिटायरमेंट से तीन महीने पहले सपा मुखिया मुलायम सिंह के आगे अनिल गुप्ता आंखों में आंसू भर कर गुहार लगा रहे है कि उनके रिटायरमेंट के तीन महीने बचे है, लिहाजा उन्हें मुख्य सचिव बना दिया जाये।
कुर्सी जो न करा दे, अनिल कुमार गुप्ता को देख कर यही लग रहा है। पिछले एक हफ्ते से उन्होंने नौकरशाही की इस सबसे बड़ी कुर्सी को हासिल करने के लिए दिन रात एक कर दिया है । यादव परिवार के कुछ लोगों से जमकर पैरवी कराई जा रही है। अगर सूत्रों पर भरोसा करे तो अनिल कुमार गुप्ता ने एक बड़ी धनराशि भी खर्च कर दी है कि किसी भी तरह उन्हें मुख्य सचिव की कुर्सी मिल जाये। अनिल गुप्ता को यकीन है कि नेताजी के सामने उनकी आंख से निकले आंसू उन्हें इस कुर्सी तक पंहुचा देंगे, मगर मामला सीएम पर आकर अटक गया है। प्रमुख सचिव गृह रहते अनिल गुप्ता ने मुजफ्फरनगर दंगो के राहत शिविर में ठण्ड से बच्चों की मौत पर बयान दिया था की ठण्ड
से बच्चे नहीं मरते। अगर ऐसा होता तो साइबेरिया में कोई बच्चा जिन्दा ना होता। इस बयान से सरकार की देश भर में बहुत किरकिरी हुई थी। अपने बड़बोलेपन के कारण पहले भी अनिल गुप्ता सरकार की बहुत फजीहत
करा चुके हंै।

पहले भी करा चुके हैं पीआईएल
मुख्य सचिव की कुर्सी के लिए उनकी यह कोशिश पहली बार नहीं है। जिस समय आलोक रंजन को मुख्य सचिव बनाने की बात हो रही थी तब भी अनिल गुप्ता ने ऐसी ही खुराफात की थी। तब आलोक रंजन के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर हुई थी। सीएम को इस बार भी पुख्ता जानकारी मिल गई थी कि इस जनहित याचिका के पीछे भी अनिल गुप्ता का ही हाथ है। सीएम जानते है कि ऐसे आदमी को चुनाव से पहले मुख्य सचिव बनाने के कितने खतरनाक नतीजे हो सकते है। दूसरे अनिल गुप्ता के रिटायरमेंट में सिर्फ तीन महीने बचे हैं। इस हालात में प्रदेश के अफसर भी उनकी बात सुनेंगे इसकी उम्मीद कम है। मगर अनिल गुप्ता अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोडऩा चाहते इसलिए उनकी कोशिशें जारी है ।

स्वामी ने बदल लिये ’स्वामी‘, अब क्या करेंगी माया

  • भाजपा के केशव प्रसाद मौर्या का जवाब देंगे सपा के स्वामी प्रसाद मौर्या
  • प्रदेश में मौर्या वोट बैंक के लिए छिड़ी राजनीतिक पार्टियों में जंग
  • सिनोद शाक्य को मायावती दे सकती हैं बड़ी जिम्मेदारी

प्रभात तिवारी

लखनऊ। स्वामी प्रसाद मौर्या ने अपना स्वामी बदल लिया है। उन्होंने बसपा सुप्रीमो मायावती से नाता तोडक़र अपने पुराने साथी और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से जुडऩे का फैसला कर लिया है। उनके इस फैसले से यूपी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान मौर्या और कुशवाहा समुदाय के वोट बैंक को टार्गेट कर केशव प्रसाद मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष बनाने वाली भाजपा के मंसूबों पर पानी फिर गया है। इतना ही नहीं बसपा सुप्रीमो मायावती भले ही स्वामी प्रसाद मौर्या के पार्टी छोडऩे को सुखद अनुभूति मान रहीं हो लेकिन उनकी पार्टी को भी आने वाले चुनाव में काफी नुकसान हो सकता है। जबकि 27 जून को होने वाले प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में स्वामी प्रसाद मौर्या को मंत्रीपद की शपथ दिलाए जाने की पूरी उम्मीद है।
बहुजन समाज पार्टी में लंबे समय से मायावती के बाद दो की कुर्सी के लिए खींचतान चल रही थी। इसमें सतीश चन्द्र मिश्रा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्या और अशोक सिद्धार्थ समय-समय पर खुद को साबित करने की कोशिश करते रहे हैं। इन सबके बावजूद स्वामी प्रसाद मौर्या को पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष बनाया था, जिसकी वजह से खुद को माया का करीबी समझने वालों की मुश्किलें बढ़ गई थीं। ऐसे में स्वामी प्रसाद मौर्या की तरफ से लोकायुक्त की नियुक्ति के अलावा विभिन्न मसलों पर राज्यपाल और चीफ जस्टिस को पत्र लिखे जाने से लेकर टिकटों के बंटवारे से जुड़ी गतिविधियों को पार्टी के लिए खतरनाक बताने की कोशिश की जाती रही। शेष पेज 8 पर

स्वामी के जुडऩे से सपा को मिलेगा लाभ
बसपा से बाबूलाल कुशवाहा की विदाई के बाद स्वामी प्रसाद मौर्या ही अपनी जाति के कद्दावर नेता माने जाते रहे हैं। स्वामी के पार्टी छोडऩे के यूपी में कोइरी और कुर्मी समुदाय (ओबीसी) के वोट बैंक पर अच्छा-खासा प्रभाव पडऩे की आशंका है। चूंकि स्वामी प्रसाद मौर्या, मौर्य-कुशवाहा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जिसका वोट बैंक यूपी में करीब 8 फीसदी है। मौर्य व कुशवाहा जाति का फिरोजाबाद, एटा, मैनपुरी, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, बदायूं, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, गोरखपुर, इलाहाबाद, देवरिया, मऊ जैसे जिलों में 7 से 10 फीसदी वोट बैंक है। यह वोट बैंक पार्टी से छिन सकता है। जबकि स्वामी प्रसाद मौर्या को पार्टी में जोडऩे में कामयाब रही सपा को इस समुदाय के वोट बैंक की बढ़त मिलेगी।

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