अंतरिक्ष में स्वदेशी उड़ान

शशांक द्विवेदी
भारत ने एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए स्वदेशी आरएलवी यानी पुन: प्रयोग किए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान के पहले प्रौद्योगिकी प्रदर्शन का आंध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण कर लिया है। री यूजेबल लांच व्हीकल (आरएलवी) पृथ्वी के चारों ओर कक्षा में उपग्रहों को प्रक्षेपित करने और फिर वापस वायुमंडल में प्रवेश करने में सक्षम है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रवक्ता ने आरएलवी-टीडी एचईएक्स-1 के उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद बताया, ‘अभियान सफलतापूर्वक पूरा किया गया।Ó यह पहली बार है, जब इसरो ने पंखों से युक्त किसी यान का प्रक्षेपण किया है। यह यान बंगाल की खाड़ी में तट से लगभग 500 किलोमीटर की दूरी पर उतरा। हाइपरसोनिक उड़ान प्रयोग कहलाने वाले इस प्रयोग में उड़ान से लेकर वापस पानी में उतरने तक में लगभग 10 मिनट का समय लगा।
री यूजेबल लांच व्हीकल टेक्नोलॉजी डीमोंस ट्रेटर (आरएलवी-टीडी ) पुन: प्रयोग किए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान का छोटा प्रारूप है। आरएलवी को भारत का अपना अंतरिक्ष यान कहा जा रहा है। इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार, यह लागत कम करने, विश्वसनीयता कायम रखने और मांग के अनुरूप अंतरिक्षीय पहुंच बनाने के लिए एक साझा हल है। इसरो ने कहा कि आरएलवी-टीडी प्रौद्योगिकी प्रदर्शन अभियानों की एक शृंखला है, जिन्हें एक समग्र पुन: प्रयोग योग्य यान ‘टू स्टेज टू ऑर्बिटÓ को जारी करने की दिशा में पहला कदम माना जाता रहा है।
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, इसे एक ऐसा उड़ान परीक्षण मंच माना जा रहा है, जिस पर हाइपरसोनिक उड़ान, स्वत: उतरने और पावर्ड क्रूज फ्लाइट जैसी विभिन्न अहम प्रौद्योगिकियों का आकलन किया जा सकता है। विमान जैसा दिखने वाला 6.5 मीटर लंबा यह यान एक विशेष रॉकेट बूस्टर की मदद से वायुमंडल में भेजा गया। इस यान का वजन 1.75 टन था। आरएलवी-टीडी को पुन: प्रयोग किए जा सकने वाले रॉकेट के विकास की दिशा में एक ‘बेहद शुरुआती कदमÓ माना जा रहा है। इसके अंतिम प्रारूप के विकास में 10 से 15 साल लग सकते हैं। फिलहाल इसरो ने स्वदेश निर्मित पुन: प्रयोग योग्य प्रक्षेपण यान- प्रौद्योगिकी प्रदर्शक का सफल परीक्षण कर दुनियां के स्पेस मार्केट में एक हलचल जरूर पैदा कर दी है।
अब इसरो अपने कुछ खास मिशन पर काम करने जा रहा है जिनकी सफलता के बाद भारत अंतरिक्ष की दुनिया में शीर्ष पर होगा। चंद्रयान-1, मंगल यान और अब स्पेस शटल की सफलता के साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपण का शतक लगाने के बाद इसरो तीन और महत्वपूर्ण मिशनों पर कार्य तेज करने जा रहा है। इनमें पहला कदम है अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजना। दूसरा मिशन चंद्रमा की सतह पर एक रोवर उतारना और तीसरा मिशन सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य उपग्रह का प्रक्षेपण करना है। इन सभी महत्वपूर्ण मिशनों को अगले चार सालों के भीतर अंजाम दिया जाएगा। मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक मंगलयान के पहुंचने के बाद इसरो के वैज्ञानिक अभियान की सफलता को लेकर काफी आश्वस्त हैं।
चंद्रयान-1 मंगल यान की कामयाबी के बाद भारत की निगाहें अब आउटर स्पेस पर हैं। इसरो ग्रहों की तलाश के लिए मिशन भेजने की योजना बना रहा है। खास बात यह है कि इसमें एक मानव मिशन भी शामिल है। मानव स्पेसफ्लाइट कार्यक्रम का उद्देश्य पृथ्वी की निचली कक्षा के लिए दो में से एक चालक दल को ले जाने और पृथ्वी पर एक पूर्वनिर्धारित गंतव्य के लिए सुरक्षित रूप से उन्हें वापस जाने के लिए एक मानव अंतरिक्ष मिशन शुरू करने की है। कार्यक्रम इसरो द्वारा तय चरणों में लागू करने का प्रस्ताव है। वर्तमान में, पूर्व परियोजना गतिविधियों क्रू मॉड्यूल,पर्यावरण नियंत्रण और लाइफ सपोर्ट सिस्टम, क्रू एस्केप सिस्टम, आदि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के विकास पर इसरो ध्यान दे रहा है ।
जीएसएलवी प्रक्षेपण यान द्वारा प्रस्तावित इस अभियान में भारत में निर्मित एक लूनर ऑर्बिटर (चन्द्र यान), एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल होंगे। इसरो के अनुसार यह अभियान विभिन्न नई प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल तथा परीक्षण के साथ नए प्रयोग भी करेगा। पहिएदार रोवर चन्द्रमा की सतह पर चलेगा तथा ऑन-साइट विश्लेषण के लिए मिट्टी या चट्टान के नमूनों को एकत्र करेगा। आंकड़ों को चंद्रयान-2 ऑर्बिटर के माध्यम से पृथ्वी पर भेजा जाएगा। इस अभियान को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल एमके-2 द्वारा भेजे जाने की योजना है उड़ान के समय इसका वजन लगभग 2,650 किलो होगा। सूर्य कॅरोना का अध्ययन एवं धरती पर इलैक्ट्रोनिक संचार में व्यवधान पैदा करने वाली सौर-लपटों की जानकारी हासिल करने के लिए इसरो आदित्य-1 उपग्रह छोड़ेगा। इसका प्रक्षेपण वर्ष 2012-13 में होने था मगर अब इसरो ने इसका नया प्रक्षेपण कार्यक्रम तैयार किया है। इसरो अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने कहा है कि अब आदित्य-1 का प्रक्षेपण वर्ष 2017 के बाद किया जाएगा।
स्पेस शटल की संचालित उड़ानों के लिए कोशिश करने वाले चंद देशों में अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान शामिल हैं। अमेरिका ने अपना स्पेस शटल 135 बार उड़ाया और वर्ष 2011 में उसकी अवधि खत्म हो गई। रुस ने एक ही स्पेस शटल बनाया। भारत ने 15 साल पहले से अपनी स्पेस शटल बनाने के विचार को अपना लिया था लेकिन इसकी शुरुआत पांच साल पहले ही हुई। कुल मिलाकर इसरो द्वारा स्वदेशी स्पेस शटल की लांचिंग एक बड़ा कदम है। इसकी सफलता अंतरिक्ष में भारत के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोल देगी।

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